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बंदा सिंह बहादुर जी की जिंदगी का आखरी दिन जब मुगलों ने सारी क्रूरता की हदें पार करते हुए उनके सामने तेज धार वाली तलवार से उनके बेटे को काट दिया और उसका तड़पता हुआ कलेजा निकाल कर सिंह जी के मुंह में डाल दिया |By वनिता कासनियां पंजाब पृष्ठभूमि----8 महीने मुगलों ने डाले रखा घेरा-दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी की 'बाबा बंदा सिंह बहादुर के अंतिम दिन और दो सिख शहीद बच्चे' पुस्तक में प्रोफेसर हरबंस सिंह लिखते हैं कि बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों की अंतिम दिनों की कहानी बेहद दर्दनाक है.मार्च, 1715 में बंदा सिंह बहादुर[1] अपने सिपाहियों के साथ गुरदास नंगल[2] की गढ़ी में घिर गए. मुगलों ने गढ़ी में जाने वाले सभी रास्तों की नाकाबंदी कर दी गई. किले तक पहुंचने वाले भोजन और पीने के पानी पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई.मुगल सेना के लगभग 30 हजार सिपाहियों ने किले को चारों तरफ से घेर लिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह डर रह-रहकर सता रहा था कि कहीं बंदा सिंह बहादुर इस घेरे को तोड़कर निकल न जाए.कई महीनों तक बंदा सिंह बहादुर[3] और उसके साथी अपना पेट भरने के लिए गढ़ी में पैदा हुई घास और पेड़ों के पत्ते खाते रहे. इसके बाद पशुओं की हड्डियों को पीसकर आटे के स्थान पर प्रयोग किया गया.सब कुछ खत्म होने के बाद नौबत यहां तक आ गई कि सभी योद्धाओं को अपनी जांघों का मांस काटकर और भूनकर खाना पड़ा.इन सारी मुसीबतों और परेशानियों के होते हुए भी बंदा बहादुर के वफादार सिपाहियों ने 8 महीनों तक मुगल फौजों का डटकर मुकाबला किया.भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े मुगलजब बचने का कोई रास्ता नहीं बचा तो शरीरिक रूप से कमजोर हो चुके इन योद्धाओं ने गढ़ी के दरवाजे खोल दिए.शाही फौज भूखे भेड़ियों की तरह बीमार और भूख के शिकार सिखों पर टूट पड़ी और लगभग 300 सिखों का नंगी तलवारों से कत्ल कर दिया गया.17 दिसंबर, 1715 को बंदा सिंह बहादुर समेत 740 सिखों को लोहे की जंजीरों में जकड़कर कैद कर लिया गया.कत्ल किए गए योद्धाओं के सिरों को काटकर और पेट को चीरकर उनमें भूसा भर दिया गया. उनके सिरों को ऊंची बांस पर टांग दिया गया.कैद किए गए सिखों को दिल्ली ले जाया जाना था, इससे पहले इन्हें जंजीरों में जकड़कर बेहद घटिया वस्त्र पहनाए गए और जानवरों की पीठ पर बांधकर लाहौर के बाजारों में उनकी नुमाइश की गई.इसके बाद इन कैद किए गए योद्धाओं को दिल्ली भेजने का प्रबंध किया गया. लाहौर के सूबेदार ने स्वयं इन कैदियों को दिल्ली जाकर मुगल शासक को सौंपने की आज्ञा मांगी.बंदा सिंह को पिंजरे में बंद कर दिल्ली लाया गयाश्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरबंस सिंह दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रकाशन में छपी पुस्तक में लिखते हैं कि इन सिखों को जुलूस निकालते हुए दिल्ली में लाया गया था. सबसे आगे सिखों के सिर भूसे से भरकर नेजों और बांसों पर टंगे हुए थे.बंदा सिंह बहादुर को जंजीरों में जकड़कर पिंजरे में बंद करके हाथी पर लाद दिया गया[4] था. उनका मजाक बनाने के लिए उन्हें सुनहरी पगड़ी और जरी से सजी फूलों वाली पोशाक पहनाई गई.बंदा सिंह बहादुर के पीछे उनके अन्य साथियों को दो-दो की गिनती में एक साथ जंजीरों में जकड़कर ऊंटों के ऊपर लादा हुआ था. कई सिखों को भेड़ों के चमड़े के कपड़े पहनाए गए थे.मौत इन योद्धाओं के सिर पर नाच रही थी, बावजूद इसके उनके चेहरे पर इसकी सिकन तक न थी. वह आनंद मगन होकर वाहेगुरु की वाणी गाते चले जा रहे थे.... और जारी कर दिया मौत का फरमानबंदा सिंह बहादुर, भाई बाज सिंह, भाई फतेह सिंह, भाई ताज सिंह और अन्य 23 साथियों को त्रिपोलिया जेल में कैद करने के लिए मीर आतिश इब्राहिम-ओ-दीन-खां के सुपुर्द कर दिया गया.शेष सिखों को कत्ल करने के लिए दिल्ली के कोतवाल सरबराह खां के हवाले कर दिया गया.इन कैदियों को कत्ल करने का काम 5 मार्च 1716 को शुरू हुआ. कत्ल करने के लिए कोतवाली के चबूतरे पर लाने से पहले प्रत्येक सिख से पूछा जाता कि अगर वह मुस्लिम बन जाता है, तो उसे छोड़ दिया जाएगा और साथ ही ईनाम भी दिया जाएगा.लेकिन किसी ने भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा और हंसते-हंसते शहीद हो गए.बंदा सिंह बहादुर के साथी तो कत्ल कर दिए गए लेकिन उनकी मौत को कुछ समय के लिए टाल दिया गया, ताकि उनके गुप्त खजाने का पता लगाया जा सके.अंत में 9 जून 1716 को इनकी भी मौत का हुक्म जारी कर दिया गया.कत्ल करने से पहले बंदा सिंह बहादुर के आगे भी दो शर्त रखी गईं 'मौत या इस्लाम'?बंदा तो बंदा ठहरे उन्होंने खुशी से मौत वाला रास्ता चुन लियाबेटे का कलेजा मुंह में डाल दियामौत से पहले बंदा सिंह को सुनहरी कपड़े पहनाकर कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर लाया गया और दरगाह के चारों ओर घुमाया गया.इसके बाद बंदा सिंह बहादुर को एक स्थान पर बैठा दिया गया और उनके चार वर्षीय बेटे अजय सिंह को उनकी गोद में रख दिया.बंदा सिंह से कहा गया कि वह अपने हाथों से अपने बच्चे का कत्ल कर दे.जब बंदा सिंह ने यह करने से मना कर दिया तो जल्लाद ने स्वयं तेज धार वाली तलवार से अजय सिंह के टुकड़े कर दिए और उसका तड़फता कलेजा[5] निकालकर बंदा सिंह के मुंह में ठूंस दिया.अपने बच्चे का कत्ल भी उन्हें अपने फैसले से डिगा नहीं पाया और उन्होंने मौत को गले लगाना बेहतर समझा.इसके बाद जल्लादों ने खंजर मार कर बंदा सिंह की आंख निकाल दी और बायां पैर काट दिया. गर्म चिमटों से उनके शरीर का मांस नौचा गया.हड्डियों से चिपका मांस कितनी देर टिकता, वह सब खींच लिया गया और जब मांच के नीचे से सफेद हड्डियां दिखाई देने लगीं, तो उनके शरीर के प्रत्येक अंग को काटकर अलग-अलग कर दिया गया.बंदा सिंह बहादुर ने यह अत्याचार बड़ी दिलेरी से सहा.इसके बाद उनके शेष बचे साथियों को भी इसी तरह से मार दिया गया.इस तरह से बाबा बंदा सिंह ने बड़ी बहादुरी के साथ मौत को गले लगाया, लेकिन मुगलों के जुल्म और यातनाएं उन्हें डिगा न सकीं.रविंद्र नाथ ठाकुर ने उलिखउनकी बेदर्दी से हत्या पर कुछ ऐसा लिखा थाদেখিতে দেখিতে গুরুর মন্ত্রেজাগিয়া উঠেছে শিখনির্মম, নির্ভীক(The chants of the Guru have led to the Sikhs rising in protestThey are fearless ...)वनिता कासनियां पंजाब:शायद इसीलिए बंदा सिंह जी की बहादुरी जो इतिहास किताबों से गायब कर दिया गया है ताकि हमें यह बताया जा सके कि मुगल कितने महान थे|फुटनोट:

बंदा सिंह बहादुर जी की जिंदगी का आखरी दिन जब मुगलों ने सारी क्रूरता की हदें पार करते हुए उनके सामने तेज धार वाली तलवार से उनके बेटे को काट दिया और उसका तड़पता हुआ कलेजा निकाल कर सिंह जी के मुंह में डाल दिया|

By वनिता कासनियां पंजाब

पृष्ठभूमि----

8 महीने मुगलों ने डाले रखा घेरा-

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी की 'बाबा बंदा सिंह बहादुर के अंतिम दिन और दो सिख शहीद बच्चे' पुस्तक में प्रोफेसर हरबंस सिंह लिखते हैं कि बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों की अंतिम दिनों की कहानी बेहद दर्दनाक है.

मार्च, 1715 में बंदा सिंह बहादुर[1] अपने सिपाहियों के साथ गुरदास नंगल[2] की गढ़ी में घिर गए. मुगलों ने गढ़ी में जाने वाले सभी रास्तों की नाकाबंदी कर दी गई. किले तक पहुंचने वाले भोजन और पीने के पानी पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई.

मुगल सेना के लगभग 30 हजार सिपाहियों ने किले को चारों तरफ से घेर लिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह डर रह-रहकर सता रहा था कि कहीं बंदा सिंह बहादुर इस घेरे को तोड़कर निकल न जाए.

कई महीनों तक बंदा सिंह बहादुर[3] और उसके साथी अपना पेट भरने के लिए गढ़ी में पैदा हुई घास और पेड़ों के पत्ते खाते रहे. इसके बाद पशुओं की हड्डियों को पीसकर आटे के स्थान पर प्रयोग किया गया.

सब कुछ खत्म होने के बाद नौबत यहां तक आ गई कि सभी योद्धाओं को अपनी जांघों का मांस काटकर और भूनकर खाना पड़ा.

इन सारी मुसीबतों और परेशानियों के होते हुए भी बंदा बहादुर के वफादार सिपाहियों ने 8 महीनों तक मुगल फौजों का डटकर मुकाबला किया.

भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े मुगल

जब बचने का कोई रास्ता नहीं बचा तो शरीरिक रूप से कमजोर हो चुके इन योद्धाओं ने गढ़ी के दरवाजे खोल दिए.

शाही फौज भूखे भेड़ियों की तरह बीमार और भूख के शिकार सिखों पर टूट पड़ी और लगभग 300 सिखों का नंगी तलवारों से कत्ल कर दिया गया.

17 दिसंबर, 1715 को बंदा सिंह बहादुर समेत 740 सिखों को लोहे की जंजीरों में जकड़कर कैद कर लिया गया.

कत्ल किए गए योद्धाओं के सिरों को काटकर और पेट को चीरकर उनमें भूसा भर दिया गया. उनके सिरों को ऊंची बांस पर टांग दिया गया.

कैद किए गए सिखों को दिल्ली ले जाया जाना था, इससे पहले इन्हें जंजीरों में जकड़कर बेहद घटिया वस्त्र पहनाए गए और जानवरों की पीठ पर बांधकर लाहौर के बाजारों में उनकी नुमाइश की गई.

इसके बाद इन कैद किए गए योद्धाओं को दिल्ली भेजने का प्रबंध किया गया. लाहौर के सूबेदार ने स्वयं इन कैदियों को दिल्ली जाकर मुगल शासक को सौंपने की आज्ञा मांगी.

बंदा सिंह को पिंजरे में बंद कर दिल्ली लाया गया

श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरबंस सिंह दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रकाशन में छपी पुस्तक में लिखते हैं कि इन सिखों को जुलूस निकालते हुए दिल्ली में लाया गया था. सबसे आगे सिखों के सिर भूसे से भरकर नेजों और बांसों पर टंगे हुए थे.

बंदा सिंह बहादुर को जंजीरों में जकड़कर पिंजरे में बंद करके हाथी पर लाद दिया गया[4] था. उनका मजाक बनाने के लिए उन्हें सुनहरी पगड़ी और जरी से सजी फूलों वाली पोशाक पहनाई गई.

बंदा सिंह बहादुर के पीछे उनके अन्य साथियों को दो-दो की गिनती में एक साथ जंजीरों में जकड़कर ऊंटों के ऊपर लादा हुआ था. कई सिखों को भेड़ों के चमड़े के कपड़े पहनाए गए थे.

मौत इन योद्धाओं के सिर पर नाच रही थी, बावजूद इसके उनके चेहरे पर इसकी सिकन तक न थी. वह आनंद मगन होकर वाहेगुरु की वाणी गाते चले जा रहे थे.

... और जारी कर दिया मौत का फरमान

बंदा सिंह बहादुर, भाई बाज सिंह, भाई फतेह सिंह, भाई ताज सिंह और अन्य 23 साथियों को त्रिपोलिया जेल में कैद करने के लिए मीर आतिश इब्राहिम-ओ-दीन-खां के सुपुर्द कर दिया गया.

शेष सिखों को कत्ल करने के लिए दिल्ली के कोतवाल सरबराह खां के हवाले कर दिया गया.

इन कैदियों को कत्ल करने का काम 5 मार्च 1716 को शुरू हुआ. कत्ल करने के लिए कोतवाली के चबूतरे पर लाने से पहले प्रत्येक सिख से पूछा जाता कि अगर वह मुस्लिम बन जाता है, तो उसे छोड़ दिया जाएगा और साथ ही ईनाम भी दिया जाएगा.

लेकिन किसी ने भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा और हंसते-हंसते शहीद हो गए.

बंदा सिंह बहादुर के साथी तो कत्ल कर दिए गए लेकिन उनकी मौत को कुछ समय के लिए टाल दिया गया, ताकि उनके गुप्त खजाने का पता लगाया जा सके.

अंत में 9 जून 1716 को इनकी भी मौत का हुक्म जारी कर दिया गया.

कत्ल करने से पहले बंदा सिंह बहादुर के आगे भी दो शर्त रखी गईं 'मौत या इस्लाम'?

बंदा तो बंदा ठहरे उन्होंने खुशी से मौत वाला रास्ता चुन लिया

बेटे का कलेजा मुंह में डाल दिया

मौत से पहले बंदा सिंह को सुनहरी कपड़े पहनाकर कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर लाया गया और दरगाह के चारों ओर घुमाया गया.

इसके बाद बंदा सिंह बहादुर को एक स्थान पर बैठा दिया गया और उनके चार वर्षीय बेटे अजय सिंह को उनकी गोद में रख दिया.

बंदा सिंह से कहा गया कि वह अपने हाथों से अपने बच्चे का कत्ल कर दे.

जब बंदा सिंह ने यह करने से मना कर दिया तो जल्लाद ने स्वयं तेज धार वाली तलवार से अजय सिंह के टुकड़े कर दिए और उसका तड़फता कलेजा[5] निकालकर बंदा सिंह के मुंह में ठूंस दिया.

अपने बच्चे का कत्ल भी उन्हें अपने फैसले से डिगा नहीं पाया और उन्होंने मौत को गले लगाना बेहतर समझा.

इसके बाद जल्लादों ने खंजर मार कर बंदा सिंह की आंख निकाल दी और बायां पैर काट दिया. गर्म चिमटों से उनके शरीर का मांस नौचा गया.

हड्डियों से चिपका मांस कितनी देर टिकता, वह सब खींच लिया गया और जब मांच के नीचे से सफेद हड्डियां दिखाई देने लगीं, तो उनके शरीर के प्रत्येक अंग को काटकर अलग-अलग कर दिया गया.

बंदा सिंह बहादुर ने यह अत्याचार बड़ी दिलेरी से सहा.

इसके बाद उनके शेष बचे साथियों को भी इसी तरह से मार दिया गया.

इस तरह से बाबा बंदा सिंह ने बड़ी बहादुरी के साथ मौत को गले लगाया, लेकिन मुगलों के जुल्म और यातनाएं उन्हें डिगा न सकीं.

रविंद्र नाथ ठाकुर ने उलिखउनकी बेदर्दी से हत्या पर कुछ ऐसा लिखा था

দেখিতে দেখিতে গুরুর মন্ত্রে

জাগিয়া উঠেছে শিখ

নির্মম, নির্ভীক

(The chants of the Guru have led to the Sikhs rising in protest

They are fearless ...)

वनिता कासनियां पंजाब:

शायद इसीलिए बंदा सिंह जी की बहादुरी जो इतिहास किताबों से गायब कर दिया गया है ताकि हमें यह बताया जा सके कि मुगल कितने महान थे|

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ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ, (1506 - 1582 ਈ.)By Vnita kasnia punjab.ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ਸੰਨ 1506 ਈ: ਵਿੱਚ ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਖੱਤਰੀ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ, ਮਾਤਾ ਕਰਮ ਦੇਵੀ ਦੀ ਕੁੱਖੋਂ ਹੋਇਆ। ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਓਸ ਸਮੇਂ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਨੱਗਰ ਸੰਘਰ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਹੁਣ ਇਹ ਨੱਗਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ,ਤਰਨਤਾਰਨ ਵਿੱਚ ਹੈ। ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਇਕ ਦੁਕਾਨਦਾਰ ਸਨ ਅਤੇ ਛੋਟੇ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਸ਼ਾਹੂਕਾਰੇ ਦਾ ਕੰਮ ਵੀ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਬਚਪਨ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸਾਊ, ਮਿਠਬੋਲੜਾ ਅਤੇ ਮਸਤ ਸੁਭਾਅ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਨੇ ਆਪਣੀ ਬੱਚੀ ਦਾ ਨਾਮ ਖੀਵੀ ਰੱਖਿਆ।ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੇ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਧਾਰਮਿਕ ਬਿਰਤੀ ਵਾਲੇ ਵਿਅਕਤੀ ਸਨ ਅਤੇ ਦੇਵੀ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਸਨ।ਬਾਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਦੇ ਧਾਰਮਿਕ ਜੀਵਨ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਬੀਬੀ ‘ਤੇ ਪੈਣਾ ਕੁਦਰਤੀ ਸੀ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਾਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਹੀ ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਸੰਤੋਖ, ਸੰਜਮ ਅਤੇ ਸੱਚ ਦੇ ਸ਼ੁਭ ਗੁਣ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰ ਲਏ ਸਨ। ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੁਕਾਨ ਉੱਤੇ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਨਾਲ ਕੰਮ ਵਿੱਚ ਹਥ ਵਟਾਂਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਘਰ-ਪਰਵਾਰ ਵਿੱਚ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਸਮੇਂ ਨਿਤ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸ ਬੈਠਦੇ ਸਨ।ਬੀਬੀ ਵਿਰਾਈ ਜੀ (ਜਾਂ ਬੀਬੀ ਭਰਾਈ ਜੀ) ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਸ਼ਰਦਾਲੂ ਸਨ। ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਵੀ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਇਕ ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਪਾਸ ਨੌਕਰੀ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਬੀਬੀ ਵਿਰਾਈ ਜੀ ਦੇ ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਨਾਲ ਨੇੜਲੇ ਸੰਬੰਧ ਸਨ ਅਤੇ ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਦੇ ਪਰਵਾਰ ਦੇ ਵੀ ਨੇੜੇ ਤੋਂ ਭੂਆ ਜੀ ਸਨ।ਓਸ ਸਮੇਂ ਦੀਆਂ ਰੀਤਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਬੀਬੀ ਵਿਰਾਈ ਦੇ ਕਹਿਣ ਉੱਤੇ ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਦਾ ਵਿਆਹ ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਦੇ ਬੇਟੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨਾਲ ਸੰਨ 1519 ਈ: ਵਿੱਚ (16 ਮੱਘਰ ਸੰਮਤ 1576) ਹੋ ਗਿਆ। ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਅਤੇ ਪਰਵਾਰ ਨਾਲ ਵੈਸ਼ਨੋ ਦੇਵੀ ਦੇ ਤੀਰਥ ਯਾਤਰਾ ਉੱਤੇ ਜਾਇਆ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਪਰਵਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਸਮਾਜਿਕ ਸਾਂਝ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਧਾਰਮਿਕ ਸਾਂਝ ਵੀ ਸੀ। ਇਸ ਸੋਚ, ਸੁਭਾਅ, ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਸਾਂਝ ਦੇ ਕਾਰਨ ਇਹ ਨਵ-ਵਿਆਹੀ ਜੋੜੀ ਇਕਸਾਰਤਾ (similar in living styles) ਅਤੇ ਇਕਸੁਰਤਾ ( similar in thoughts) ਵਾਲੀ ਆਦਰਸ਼ਕ (Ideal couple) ਜੋੜੀ ਹੋ ਨਿੱਬੜੀ। ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਨਿੱਜੀ ਹਉਮੈ ਸਮਾਪਤ ਕਰਕੇ ਆਪਣੀ ਹਸਤੀ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਵਿੱਚ ਸਮੋ ਦਿੱਤੀ ਅਤੇ ਇਹ “ਏਕ ਜੋਤਿ ਦੁਇ ਮੂਰਤੀ” ਬਣ ਗਏ। ਗ੍ਰਿਹਸਤੀ ਜੀਵਨ ਜਿਉਂਦਿਆਂ ਇਸ ਜੋੜੀ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ ਵਿਖੇ ਦੋ ਪੁੱਤਰਾਂ ਅਤੇ ਦੋ ਧੀਆਂ ਨੇ ਜਨਮ ਲਿਆ। ਵੱਡੇ ਪੁੱਤਰ ਦਾਸੂ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ 9 ਭਾਦਰੋਂ ਸੰਮਤ 1589 ਬਿਕਰਮੀ, ਬੀਬੀ ਅਨੋਖੀ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ 29 ਜੇਠ ਸੰਮਤ 1591 ਅਤੇ ਭਾਈ ਦਾਸੂ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ 1 ਵੈਸਾਖ ਸੰਮਤ 1594 ਨੂੰ ਅਤੇ ਬੀਬੀ ਅਮਰੋ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ 2 ਪੋਹ ਸੰਮਤ 1595 ਨੂੰ ਹੋਇਆ। ਦੋਹਾਂ ਜੀਆਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਗ੍ਰਿਹਸਤ ਦੀਆਂ ਜ਼ਿੰਮੇਂਵਾਰੀਆਂ ਚੰਗੀ ਤਰਾਂ ਨਿਭਾਉਂਦਿਆਂ ਹੋਇਆਂ ਬੱਚਿਆਂ ਦਾ ਵਧੀਆ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਪਾਲਣ-ਪੋਸ਼ਣ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅੰਦਰ ਵੀ ਧਾਰਮਿਕ ਸੰਸਕਾਰ ਪੈਦਾ ਕੀਤੇ।ਜਦੋਂ ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਅਤੇ ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਹਰ ਵਰ੍ਹੇ ਧਾਰਮਿਕ ਯਾਤਰਾ ਉੱਤੇ ਜਾਇਆ ਕਰਦੇ ਸਨ ਤਾਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਵੀ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਨਾਲ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਸਨ। ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਜੀ ਦੇ ਅਕਾਲ ਚਲਾਣੇ ਮਗਰੋਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀਆਂ ਸੰਭਾਲੀਆਂ। ਹੁਣ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਵੀ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਵਾਂਗ ਹੋਰ ਦਰਸ਼ਨ-ਅਭਿਲਾਖੀਆਂ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਤੀਰਥ ਯਾਤਰਾ ਉੱਤੇ ਜਾਣ ਲਗ ਪਏ। ਪਰੰਤੂ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਆਤਮਿਕ ਤ੍ਰਿਪਤੀ ਨਹੀਂ (spiritually unsatisfied) ਸੀ ਹੋ ਰਹੀ। ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਆਤਮਿਕ ਤ੍ਰਿਪਤੀ ਦੀ ਭਾਲ ਵਿੱਚ ਹਮੇਸ਼ਾ ਹੀ ਆਸ਼ਾਵਾਦੀ ਅਤੇ ਤਾਂਘ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਦੀ ਮਾਨਸਿਕ ਦਸ਼ਾ ਤੋਂ ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਜੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਣੂ ਸਨ ਅਤੇ ਉਹ ਆਪ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਹਿਮਤ ਸਨ। ਅੰਤ ਉਹ ਸੁਭਾਗਾ ਦਿਹਾੜਾ ਵੀ ਆ ਗਿਆ ਜਦੋਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ, ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਬਾਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਚਲੇ ਗਏ। ਬਸ ਫਿਰ ਕੀ ਸੀ, ਪਹਿਲੀ ਮੁਲਾਕਾਤ ਵਿੱਚ ਹੀ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਵਸਤੂ, ਸੱਚ, ਸੰਤੋਖ, ਆਤਮਿਕ ਤ੍ਰਿਪਤੀ ਅਤੇ ਸ਼ਾਂਤੀ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੋ ਗਈ ਅਤੇ ਉਹ ਨਿਹਾਲ ਹੋ ਗਏ। ਹੁਣ ਤੋਂ ਉਹ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਹੀ ਹੋ ਕੇ ਰਹਿ ਗਏ ਅਤੇ 7 ਸਾਲ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀ ਸੰਗਤ ਕੀਤੀ।ਪੂਰਬ ਕਰਮ ਅੰਕੁਰ ਜਬ ਪ੍ਰਗਟੇ ਭੇਟਿਓ ਪੁਰਖੁ ਰਸਿਕ ਬੈਰਾਗੀ॥ ਭਾਵ: ਇਸੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਪਹਿਲਾਂ ਬੀਤ ਚੁਕੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਕੀਤੇ ਕੰਮਾ ਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਬਣੀਆਂ ਆਦਤਾਂ ਅਤੇ ਅਪਨਾਈਆਂ ਕਦਰਾਂ ਕੀਮਤਾਂ ਅਨੁਸਾਰ...ਮਿਟਿਓ ਅੰਧੇਰੁ ਮਿਲਤ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਸੋਈ ਜਾਗੀ॥ (ਪੰਨਾ 204)ਕਰਤਾਰ ਪੁਰ ਤੋਂ, ਕਦੇ ਕਦੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਖਡੂਰ ਵਾਪਸ ਜਾਂਦੇ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਲੈਂਦੇ। ਇਸੇ ਤਰਾਂ, ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਵੀ ਕਈ ਵਾਰ, ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਮਿਲਨ ਲਈ ਕਰਤਾਰ ਪੁਰ ਜਾਂਦੇ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਜਾਕੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਅਤੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਨੂੰ ਸੁਣਦੇ, ਸਮਝਦੇ ਅਤੇ ਬੜੇ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਹੁੰਦੇ। ਇਥੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਤੀਂਵੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਸਤਿਕਾਰ ਬਖਸ਼ਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਤੀਂਵੀਆਂ ਨੂੰ ਘੁੰਡ ਕੱਢਣ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਸੰਗਤ ਵਿੱਚ ਆਉਣ ਲਈ ਪ੍ਰਚਾਰਦੇ ਸਨ। ਤੀਂਵੀ ਜਾਤੀ ਲਈ ਘੁੰਡ ਕਢਣ ਦੇ ਬਗੈਰ ਆਉਣਾ ਇਕ ਨਵੀਂ ਰੀਤ ਸੀ। ਸਮਾਜ ਲਈ ਸਦੀਆਂ ਪੁਰਾਨੀ ਤੀਂਵੀ ਦੀ ਘੁੰਢ ਕੱਢਕੇ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਵਿਚਰਨ ਦੀ ਰੀਤ ਨੂੰ ਬਦਲਨਾ ਇਕ ਬੜੀ ਅਚੰਬੇ ਦੀ ਗਲ ਸੀ। ਇਸੇ ਤਰਾਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਵਲੋਂ ਸੰਗਤਾਂ ਲਈ ਲੰਗਰ ਚਲ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜਿਥੇ ਮਰਦ ਅਤੇ ਤੀਂਵੀਆਂ ਲੰਗਰ ਵਿੱਚ ਇਕੱਠੇ ਜ਼ੁਮੇਵਾਰੀ ਨਿਭਾ ਰਹੇ ਸਨ ਅਤੇ ਸੇਵਾ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ।ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਇਸ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿੱਚ ਆਉਣ ਸਮੇਂ, ਲੋਕ ਸਮਾਜਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਅਖੌਤੀ ਜਾਤ-ਪਾਤ, ਊਚ ਨੀਚ, ਛੂਤ ਆਦਿ ਦੀ ਵਰਨ-ਆਸ਼ਰਮ ਵੰਡ ਕਰਕੇ ਬੁਰੀ ਤਰਾਂ ਵੰਡੇ ਹੋਏ ਸਨ। ਧਾਰਿਮਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ, ਸ਼ੂਦਰ ਅਤੇ ਨੀਵੀਆਂ ਜਾਤੀਆਂ ਨੂੰ ਮੰਦਰਾਂ ਵਿੱਚ ਜਾਣਾ ਅਤੇ ਰੱਬ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨੀ ਮਨ੍ਹਾਂ ਸੀ। ਉਚ ਜਾਤੀ ਅਨੁਸਾਰ, ਅਖੌਤੀ ਸ਼ੂਦਰ ਅਤੇ ਨੀਵੀਆਂ ਜਾਤੀਆਂ ਨੂੰ ਰੱਬ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਹਕ ਨਹੀਂ ਸੀ।ਤੀਵੀਂ ਭਾਵੇਂ ਅਖੌਤੀ ਉੱਚੀ ਜਾਤ ਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿੱਚੋਂ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਅਖੌਤੀ ਨੀਵੀਂ ਜਾਤ ਦੀ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਮੰਦਰਾਂ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਅਤੇ ਰੱਬ ਦੀ ਪੂਜਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਰ ਸਕਦੀ।ਅਮੀਰ, ਸ਼ਾਹੂਕਾਰ ਅਤੇ ਜਾਗੀਰਦਾਰ ਲੋਕ ਗਰੀਬ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਹਰ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਤੰਗ ਕਰਦੇ ਅਤੇ ਲੁਟਦੇ ਸਨ। ਰਾਜਨੀਤਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਗਰੀਬ ਅਤੇ ਅਖੌਤੀ ਨੀਵੀਂ ਜਾਤ ਨੂੰ ਕੋਈ ਇਨਸਾਫ ਨਹੀਂ ਸੀ ਮਿਲਦਾ। ਸਰਕਾਰੀ ਅਫਸਰ ਵੱਡੀ ਖੋਰ ਅਤੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟ ਸਨ ਜੋ ਗਰੀਬਾਂ ਅਤੇ ਅਖੌਤੀ ਨੀਵੀਂ ਜਾਤ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਤੰਗ ਅਤੇ ਪ੍ਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰਦੇ ਸਨ।ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਸਰਬਪੱਖੀ ਇਨਕਲਾਬੀ ਲਹਿਰ ਅਰੰਭੀ ਜਿਸ ਰਾਹੀਂ ਆਪ ਨੇ ਭਾਰਤ ਅਤੇ ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਹਰ ਪੱਖੋਂ ਕਾਇਆ ਕਲਪ ਕਰ ਦਿੱਤੀ। ਹਰ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਅਸਚਰਜ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਕਾਰਨਾਮੇ ਕੀਤੇ ਅਤੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸੋਚ ਤੋਂ ਪਰ੍ਹੇ ਦੀਆਂ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਲਿਆਂਦੀਆਂ। ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਸਮਾਜਿਕ ਪਖੋਂ (socially), ਧਾਰਮਿਕ ਪਖੋਂ (religiously) , ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਪਖੋਂ (politically) , ਸਮਾਜਕ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਪਖੋਂ ( community mentality) ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ( economic) ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਇਤਿਹਾਸ ਨੇ ਇਕ ਨਵਾਂ ਮੋੜ ਲਿਆਂਦਾ। ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਪੁਰਾਣੇ ਜਗੀਰਦਾਰੀ (Landlord system) , ਸਰਮਾਏਦਾਰੀ (capitalism), ਅਜਾਰੇਦਾਰੀ, ਪੂੰਜੀਪਤੀ ( banking) ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਅਤੇ ਕਰਮਕਾਂਡੀ ( false ritualism), ਪਾਖੰਡੀ, ਕਪਟੀ ਅਤੇ ਛਲੀ ਲੋਕਾਂ ਵਲੋਂ ਅਖੌਤੀ ਧਾਰਮਿਕ ਰਹੁਰੀਤੀਆਂ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਬਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਜਾਗ੍ਰਤੀ ਲਿਆਂਦੀ। ਐਸ਼ਪ੍ਰਸਤੀ ਵਿੱਚ ਗ੍ਰਸੇ ਹੋਏ ਜਗੀਰਦਾਰ ਅਤੇ ਅਖੌਤੀ ਉੱਚ ਜਾਤੀਆਂ ਦੇ ਲੋਕ, ਸਾਧਾਰਨ ਪਰਜਾ ਉਤੇ ਜ਼ੁਲਮ ਢਾਹੁਣ ਵਾਲੇ ਰਜਵਾੜੇ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਦੇ ਕਰਮਚਾਰੀ ਗਰੀਬ ਕਿਰਤੀਆਂ ਅਤੇ ਅਖੌਤੀ ਸ਼ੂਦਰਾਂ ਦੀਆਂ ਜਿੰਦਗੀਆਂ ਨਾਲ ਖਿਲਵਾੜ ਅਤੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਸਮਾਜ ਦੇ ਠੇਕੇਦਾਰ ਤੀਵੀਂ ਜਾਤੀ ਨੂੰ ਉਸਦਾ ਬਣਦਾ ਸਨਮਾਨ ਦੇਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰੀ ਸਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਦੇ ਵਿਰੁਧ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਆਵਾਜ਼ ਉਠਾਈ ਅਤੇ ਦਸ ਜਾਮਿਆਂ ਵਿੱਚ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਪਹਿਲੂਆਂ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਲਿਆਂਦਾ। ਲੋਕ-ਮਾਰੂ, ਭਿ੍ਸ਼ਟ ਅਤੇ ਜ਼ੁਲਮੀ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਤਹਿਸ-ਨਹਿਸ ਕਰ ਕੇ “ਨਾਨਕ ਨਿਰਮਲ ਪੰਥ ਚਲਾਇਆ॥” ਅਨੁਸਾਰ ਇੱਕ ਨਵੇਂ ਸਮਾਜ ਦੀ ਨੀਂਹ ਰੱਖੀ ਜਿਸ ਰਾਹੀਂ ਹਰ ਮਨੁਖ ਨੂੰ ਬਰਾਬਰਤਾ ਅਤੇ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਪੂਰੇ ਹੱਕ ਲੈਣ ਲਈ ਜਾਗਰਤ ਅਤੇ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਕੀਤਾ।ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਸਾਰੀ ਮਨੁਖ ਜਾਤੀ ਦੀ ਹਰ ਪਖੋਂ ਪ੍ਰਫੁਲਤਾ ਦੇ ਇਸ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਸਫਲਤਾ ਲਈ ਆਪਣਾ ਨਿੱਜੀ ਅਮਲੀ ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਇਕ ਆਦਰਸ਼ਕ ਜੀਵਨ ਰੋਲ-ਮਾਡਲ ਦੇ ਤੌਰ ਉੱਤੇ ਸੰਸਾਰ ਸਾਹਮਣੇ ਪੇਸ਼ ਕੀਤਾ।ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਇਨਕਲਾਬ ਅਤੇ ਕ੍ਰਾਂਤੀਆਂ ਆਈਆਂ ਅਤੇ ਕਈ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਾਰਥਕ ਨਤੀਜੇ ਵੀ ਨਿਕਲੇ ਪਰੰਤੂ ਇਹ “ਸਿੱਖ ਕ੍ਰਾਂਤੀ” ਅਤੇ “ਸਿੱਖ ਇਨਕਲਾਬ” ਆਪਣੀ ਹੀ ਕਿਸਮ ਦਾ ਮੁਕੰਮਲ, ਨਿਰਾਲਾ ਅਤੇ ਨਿਵੇਕਲਾ ਸੀ ਜੋ ਸਾਰਥਕ ਸੀ।ਇਸ ਕ੍ਰਾਂਤੀ ਵਿੱਚ ਹੋਰਨਾਂ ਪਹਿਲੂਆਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਸਮੇਂ ਦੇ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਤੀਵੀਂ ਦੀ ਦੁਰਗਤੀ, ਅਪਮਾਨ, ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਅਤੇ ਬੇਹੁਰਮਤੀ ਹੋ ਰਹੀ ਸੀ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਤੀਵੀਂ ਅਬਲਾ, ਨਿਮਾਣੀ, ਨਿਤਾਣੀ, ਪੈਰ ਦੀ ਜੁੱਤੀ ਅਤੇ ਕਲੰਕਣ ਗਰਦਾਨੀ ਗਈ ਸੀ।ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਪੱਥਰ ਦੀ ਮੂਰਤੀ ਬਣਾ ਕੇ ਦੇਵੀ ਦੀ ਪੂਜਾ ਤਾਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਸੀ ਜੋ ਅੱਜ ਵੀ ਜਾਰੀ ਹੈ ਪਰ ਹੱਡ-ਮਾਸ ਦੀ ਜਿਉਂਦੀ-ਜਾਗਦੀ ਔਰਤ ਨਾਲ ਘਿਰਣਾ ਅਤੇ ਦੁਰ-ਵਿਵਹਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਦੇਵੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਾਰੀ ਸ਼ਕਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਵਾਨਿਆ ਤਾਂ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਪਰ ਉਸ ਦੀ ਜੀਵਤ ਹੋਂਦ-ਹਸਤੀ ਨੂੰ ਧਿਰਕਾਰਿਆ ਅਤੇ ਤ੍ਰਿਸਕਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਇਹ ਸ਼ੋਸ਼ਨ, ਹਿੰਦੂ ਭਾਈਚਾਰੇ, ਸਿਖ ਭਾਈਚਾਰੇ ਅਤੇ ਮੁਸਲਮਾਨ ਭਾਈਚਾਰੇ ਵਿੱਚ ਅਜ ਵੀ ਜਾਰੀ ਹੈ।ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ “ਇਸਤਰੀ ਜਾਤੀ” ਦੇ ਸਨਮਾਨ, ਸਤਿਕਾਰ ਅਤੇ ਸਵੈਮਾਣ ਦੀ ਬਹਾਲੀ ਲਈ ਵੀ ਭਰਪੂਰ ਹੰਭਲਾ ਮਾਰਿਆ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਠੋਸ ਦਲੀਲਾਂ ਦੇ ਕੇ ਔਰਤ ਨੂੰ ਜਗਤ-ਜਣਨੀ, ਸਮਾਜ ਦਾ ਧੁਰਾ ਅਤੇ ਸੰਸਾਰ ਦਾ ਕੇਂਦਰ-ਬਿੰਦੂ ਸਿੱਧ ਕੀਤਾ। ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਇਸ ਲਈ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਜੋ ਗ੍ਰਿਹਸਤੀ ਸਮਾਜ ਦਾ ਸਹੀ ਸੰਤੁਲਨ ਕਾਇਮ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ, ਗ੍ਰਿਹਸਤ-ਸਮਾਜ ਖੁਸ਼ਹਾਲ ਹੋ ਸਕੇ, ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਆਪਸੀ ਪਿਆਰ, ਸਤਿਕਾਰ, ਸਹਿਨਸ਼ੀਲਤਾ ਅਤੇ ਸਹਿਯੋਗ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਾਇਮ ਹੋ ਸਕੇ।ਗੁਰਮਤਿ ਨੇ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਨਵਾਂ-ਨਿਰੋਆ, ਸ੍ਰੇਸ਼ਠ ਅਤੇ ਸਾਰਥਕ ਸਿਧਾਂਤ, ਸਿਸਟਮ, ਸ਼ਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਅਤੇ ਸਦਾਚਾਰ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕੀਤਾ। ਇਹ ਸਹਿਹੋਂਦ ਅਤੇ ਸਹਿਨਸ਼ੀਲਤਾ ਦਾ ਸਿਧਾਂਤ ਸੀ ਜਿਸ ਦਾ ਆਧਾਰ ਕਿਰਤ ਕਰਨਾ, ਵੰਡ ਛਕਣਾ, ਸੇਵਾ, ਸਿਮਰਨ, ਪ੍ਰਭੂ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਧਾਰਨੀ ਬਣਨਾ, ਕਰਤੇ ਦੀ ਰਚਨਾ ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ, ਪੰਗਤ ਅਤੇ ਸੰਗਤ ਸੀ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਹੋਰਨਾਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਗਲਾਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਦਰਸ਼ਨ-ਇਸ਼ਨਾਨ ਦੀ ਸਾਂਝ, ਕਥਾ-ਕੀਰਤਨ ਅਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਗੁਣਾਂ ਅਨੁਸਾਰੀ ਜੀਵਨ ਜਿਊਣ ਦੀ ਸਾਂਝ ਅਤੇ ਬਗੈਰ ਊਚ-ਨੀਚ, ਛੂਤ, ਲਿੰਗ - ਪੁਲਿੰਗ ਦਾ ਵਿਤਕਰਾ ਰ੍ਖਣ ਦੇ ਖਾਣ-ਪੀਣ ਦੀ ਸਾਂਝ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤੀ।ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਬੀਬੀਆਂ ਨੂੰ ਬਿਨਾਂ ਘੁੰਡ ਕੱਢੇ ਆਉਣ, ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਗੁਰਬਾਣੀ-ਕੀਰਤਨ ਸੁਣਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਸੀ। ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਦੀ ਇਹੋ ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ ਰੀਤ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਪ੍ਰਚਲਤ ਕੀਤੀ। ਜਿਥੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਗੁ੍ਰੂ ਨਾਨਕ ਗਾਡੀ ਰਾਹ ਨੂੰ ਅਪਨਾ ਕੇ ਜਨਤਾ ਵਿੱਚ ਚੰਗੇ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਧਾਰਨੀ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਸਰੀਰਕ ਬਲ ਨੂੰ ਮੱਲ ਅਖਾੜੇ ਸਥਾਪਤ ਕਰਕੇ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਨਾਲ ਜੋੜਿਆ, ਉਥੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਤੀਵੀਂ ਜਾਤੀ ਨੂੰ ਬਿਨਾਂ ਘੁੰਡ ਕੱਢੇ ਆਉਣ, ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਗੁਰਬਾਣੀ-ਕੀਰਤਨ ਸੁਣਨ ਲਈ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਕੀਤਾ ਜਿਸ ਕਰਕੇ, ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਇਸਤਰੀ ਪ੍ਰਚਾਰਕ ਹੋਣ ਦਾ ਮਾਣ ਵੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਇਆ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਇਕ ਆਦਰਸ਼ਕ ਮਾਤਾ ਵੀ ਸੀ ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਬੇਟਿਆਂ ਅਤੇ ਬੇਟੀਆਂ ਅੰਦਰ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾਂ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਨੂੰ ਸੰਗਤ ਵਿਚੋਂ ਸਮਝਣ, ਸਿਖਣ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਅਪਨਾਉਣ ਲਈ ਬੁਹਤ ਪ੍ਰੇਰਤ ਕੀਤਾ। ਉਹ ਆਪਣੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨਾਲ ਅਥਾਹ ਪਿਆਰ ਵੀ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੀਆਂ ਬੇਟੀਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਪੁਤਰਾਂ ਦੀ ਤਰਾਂ ਹੀ ਪਿਆਰ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਬਹੁਪੱਖੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀਆਂ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਸੁਖ-ਅਰਾਮ ਦਾ ਵੀ ਪੂਰਾ ਧਿਆਨ ਰੱਖਦੇ ਸਨ। ਸੱਚਮੁੱਚ ਹੀ ਉਹ ਸਦਗੁਣਾਂ ਵਾਲੀ ਇਕ ਆਦਰਸ਼ਕ ਪਤਨੀ ਸਨ।ਲੰਗਰ ਬਾਰੇ ਮਹਿਮਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੇ ਕਰਤਾ ਬਾਵਾ ਸਰੂਪ ਦਾਸ ਭੱਲਾ:ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਜਿਥੇ ਆਪਣੇ ਪ੍ਰਵਚਨਾਂ ਦੁਆਰਾ ਗੁਰੂ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਜਗਿਆਸੂਆਂ ਨੂੰ ਆਤਮਕ ਗਿਆਨ ਦੇ ਭੋਜਨ ਦੁਆਰਾ ਤ੍ਰਿਪਤ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਦੀ ਭਟਕਣਾਂ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰਦੇ ਸਨ, ਉਥੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਸੰਗਤਾਂ ਵਾਸਤੇ ਲੰਗਰ ਦੇ ਪ੍ਰਬੰਧ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਦੇ ਸਨ।ਭਾਈ ਸੱਤਾ ਤੇ ਬਲਵੰਡ ਦੁਆਰਾ ਰਾਮਕਲੀ ਕੀ ਵਾਰ ਅੰਦਰ ਵਰਨਣ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ:ਬਲਵੰਡ ਖੀਵੀ ਨੇਕ ਜਨ ਜਿਸੁ ਬਹੁਤੀ ਛਾਉ ਪਤ੍ਰਾਲੀ॥ ਲੰਗਰਿ ਦਉਲਤਿ ਵੰਡੀਐ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਖੀਰਿ ਘਿਆਲੀ॥ (ਪੰਨਾ 967)ਸਹੁਰੇ-ਘਰ ਦੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਜੋ ਦੇਵੀ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਸਨ। ਜਦੋਂ ਉਹ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਆਏ ਤਾਂ ਉੱਥੋਂ ਦੀ ਸੋਭਾ, ਕਾਰਜ ਮਾਹੌਲ ਅਤੇ ਸਿਧਾਂਤ ਨੂੰ ਵੇਖ ਅਤੇ ਸਮਝ ਕੇ ਉੱਥੇ ਹੀ ਟਿਕ ਗਏ । ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਰਿਸ਼ਤੇ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਕੁੜਮ ਸਨ ਪਰੰਤੂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਜਦੋਂ ਇਹ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਗੁਰੂ-ਪਤਨੀ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਖ਼ੁਦ ਹੱਥੀਂ ਲੰਗਰ ਤਿਆਰ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਵਰਤਾ ਰਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਜੂਠੇ ਬਰਤਨ ਮਾਂਜਣ ਦੀ ਸੇਵਾ ਨਿਝਿਜਕ ਹੋ ਕੇ ਪੂਰੀ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਵੀ ਲੰਗਰ ਵਿੱਚ ਬਰਤਨ ਮਾਂਜਣ ਅਤੇ ਪਾਣੀ ਲਿਆਉਣ ਦੀ ਸੇਵਾ ਅਰੰਭ ਦਿੱਤੀ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦਾ ਜੀਵਨ ਅਨੇਕਾਂ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਲਈ ਇਕ ਮਿਸਾਲ ਅਤੇ ਪ੍ਰੇਰਨਾ-ਸ੍ਰੋਤ ਬਣਿਆ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਅੰਦਰ ਨਿਸ਼ਕਾਮ ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਜਾਗੀ।ਜਦੋਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੁੱਤਰਾਂ, ਦਾਸੂ ਜੀ ਅਤੇ ਦਾਤੂ ਜੀ ਨੇ ਘੋੜੀ ਉੱਤੇ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਦਾ ਪਿੱਛਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਬਾਸਰਕੇ ਜਾ ਕੇ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਘੇਰ ਲੈਣ ਦੀ ਗੱਲ ਸੁਣੀ ਤਾਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੇ ਦੋਹਾਂ ਪੁੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸ ਗਏ ਤਾਂ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਨੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਬਾਸਰਕੇ ਵੇਖਕੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਕਿਉਂ ਖੇਚਲ ਕੀਤੀ, ਮੈਨੂੰ ਬੁਲਾ ਲੈਣਾ ਸੀ। ਨਿਮਰਤਾ ਦੇ ਪੁੰਜ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇ ਘਰ ਦੀ ਦੌਲਤ ਹੀ ਗਰੀਬੀ ਹੈ, ਨਿਮਰਤਾ ਹੈ। ਮੈਂ ਦੋਵੇਂ ਬੱਚੇ ਲੈ ਕੇ ਆਈ ਹਾਂ। ਆਪ ਮਿਹਰ ਕਰੋ, ਖਿਮਾ ਕਰੋ ਅਤੇ ਭੁੱਲਣਹਾਰ ਜਾਣ ਕੇ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਸਮਝ ਕੇ ਬਖਸ਼ ਦਿਉ ਜੀ।” ਉਸ ਸਮੇਂ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਗੁਰੂ ਨਹੀਂ ਸਨ ਬਣੇ। ਜਦ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਬਖਸ਼ਣਹਾਰ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਹੀ ਹਨ ਤਾਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ਮੈਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਅਪਰਾਧ ਬਖਸ਼ਣ ਯੋਗ ਨਹੀਂ। ਬੱਚਿਆਂ ਉੱਤੇ ਮਿਹਰ ਕਰ ਦਿਓ।” ਭਾਈ ਅਮਰ ਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਧੰਨ ਆਖ ਕੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਛਾਤੀ ਨਾਲ ਲਾ ਲਿਆ। ਅਜੋਕੀਆਂ ਮਾਤਾਵਾਂ ਲਈ ਇਹ ਇਕ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸਾਰਥਕ ਅਤੇ ਉੱਤਮ ਉਪਦੇਸ਼ ਹੈ।ਇਸ ਦਾ ਆਧਾਰ ਹੈ “ਸੇਵਾ-ਸਿਮਰਨ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਸਹਿਜਤਾ, ਸਹਿਨਸ਼ੀਲਤਾ, ਸਾਂਝੀਵਾਲਤਾ, ਉਦਮ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਪਰਉਪਕਾਰੀ ਹੋਣਾ।” ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਜਾਤ-ਪਾਤੀ ਸਿਸਟਮ ਅਤੇ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਊਚ-ਨੀਚ, ਜਾਤ-ਪਾਤ ਦੇ ਭੇਦ ਭਾਵ ਨੂੰ ਸਮਾਪਤ ਕਰਕੇ ਇਸ ਵਿੱਚ ਆਮ ਕਿਰਤੀ, ਅਖੌਤੀ ਸੂਦਰ ਅਤੇ ਅਛੂਤ ਸਮਝੇ ਜਾਂਦੇ ਅਖੌਤੀ ਨੀਵੇਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਅਤੇ ਪੈਰ ਦੀ ਜੁੱਤੀ ਸਮਝੀ ਜਾਂਦੀ ਔਰਤ ਨੂੰ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਸਥਾਨ, ਸਨਮਾਣ, ਸਤਿਕਾਰ ਅਤੇ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟਤਾ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਾਉਣਾ ਅਤੇ “ਕਾਦਰ ਦੀ ਕੁਦਰਤ” ਵਿੱਚ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਸਾਂਝੀਵਾਲ ਬਣਾਉਣਾ ਸੀ। ਇਸ ਦਾ ਆਧਾਰ ਸਤਿਗੁਰਾਂ ਨੇ ਹੋਰਨਾਂ ਢੰਗ-ਤਰੀਕਿਆਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ “ਸੰਗਤ ਅਤੇ ਪੰਗਤ” ਦੇ ਸੰਕਲਪ ਨੂੰ ਬਣਾਇਆ। ਸੰਗਤ ਵਿੱਚ ਸਭ ???? repeated in the next few paras!!!!!ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਿੱਖ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਸੰਸਥਾ ਨਿਆਸਰਿਆਂ ਦਾ ਆਸਰਾ, ਨਿਓਟਿਆਂ ਦੀ ਓਟ, ਲੋੜਵੰਦਾਂ ਲਈ ਲੰਗਰ, ਨਿਘਰਿਆ ਲਈ ਰੈਣ-ਬਸੇਰਾ, ਆਤਮ-ਅਭਿਲਾਖੀਆਂ ਲਈ ਸਿਮਰਨ ਦਾ ਸਥਾਨ, ਗਰੀਬਾਂ ਅਤੇ ਅਨਾਥਾਂ ਲਈ ਸਹਾਇਤਾ ਦਾ ਕੇਂਦਰ, ਮਰੀਜ਼ਾਂ, ਬੀਮਾਰਾਂ ਅਤੇ ਲਾਚਾਰਾਂ ਅਤੇ ਲੋੜਵੰਦਾਂ ਲਈ ਦਵਾ-ਦਾਰੂ (ਚਕਿਤਸਾ) ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਆਦਿ ਬਣ ਗਿਆ। ਸੱਚਮੁਚ ਹੀ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸਾਹਿਬ ਸਰਬ-ਸਾਂਝੇ ਰੱਬ ਦਾ ਸਰਬ-ਸਾਂਝਾ ਪਵਿੱਤਰ ਸਥਾਨ ਬਣ ਗਿਆ। ਇਸ ਵਿੱਚੋਂ “ਸਰਬਸਾਂਝੀ ਗੁਰਬਾਣੀ” ਅਤੇ ਗੁਰਮਤਿ ਸੰਗੀਤ ਰਾਹੀਂ ਤਪਦੇ ਹਿਰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਠਾਰਦਾ ਬਾਣੀ ਰੂਪੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਵਰਸਾਇਆ ਹੈ। ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪਵਿੱਤਰ ਉਪਦੇਸ਼ ਸਾਰੀਆਂ ਧਾਰਮਿਕ, ਰਾਜਨੀਤਿਕ, ਸਮਾਜਿਕ, ਊਚ-ਨੀਚ, ਜਾਤ-ਪਾਤੀ, ਰਾਣਾ ਅਤੇ ਰੰਕ, ਗਰੀਬ-ਅਮੀਰ, ਪੜ੍ਹਿਆ-ਅਣਪੜ੍ਹਿਆ ਦੀਆਂ ਸਭ ਵੱਲਗਣਾਂ ਨੂੰ ਟੱਪ ਕੇ, ਸਰ ਕਰ ਕੇ, ਸਰਬ-ਲੋਕਾਈ ਲਈ ਇਕ ਸਮਾਨ ਹੋ ਗਿਆ। ਗੁਰਮਤਿ ਦੇ ਧਾਰਨੀ ਲਈ ਸਤ, ਸੰਤੋਖ, ਦਇਆ, ਖਿਮਾ ਆਦਿ ਉਸ ਦੇ ਗਹਿਣੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰ ਕੇ ਉਹ ਆਦਰਸ਼ਕ ਜੀਵ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਗੁਰ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵਾਨ ਚੜ੍ਹਦਾ ਹੈ। ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਲੋਕਾਈ ਸਾਹਮਣੇ ਆਪਣੇ ਆਦਰਸ਼ਕ ਜੀਵਨ ਦੁਆਰਾ “ਮਿਸਾਲੀ ਅਤੇ ਮਿਆਰੀ ਜੀਵਨ ਜੁਗਤ” ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀ। ਇਹ ਜੀਵਨ-ਜੁਗਤ, “ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਭੇਟਿਐ ਪੂਰੀ ਹੋਵੈ ਜੁਗਤਿ॥ ਹਸੰਦਿਆ ਖੇਲੰਦਿਆ ਪੈਨੰਦਿਆ ਖਾਵੰਦਿਆ ਵਿਚੇ ਹੋਵੈ ਮੁਕਤਿ॥” ਉੱਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਹੈ।ਇੱਕੋ ਸਮੇਂ ਇੱਕੋ ਸਥਾਨ (ਸਤਿਸੰਗਤ ਵਿਚ) ਇਕਸਾਰ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਦੌਲਤ ਦਾ ਲੰਗਰ ਵੰਡਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ਬਦ-ਕੀਰਤਨ, ਕਥਾ, ਪਾਠ ਅਤੇ ਅਰਦਾਸ ਕੋਈ ਵੀ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਉੱਤੇ ਕਿਸੇ ਵਿਅਕਤੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਜਾਂ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਜਾਤੀ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਤਾਂ " ਸਤਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਜਾਣੀਐ॥ ਜਿਥੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ॥” ਹੀ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਤਾਂ ਜੀਵਨ ਦੇ ਹਰਿ ਪਹਿਲੂ ਵਿੱਚ ਸੱਚ ਦਾ ਹੀ ਵਰਤਾਰਾ ਹੈ। ਖਾਣ, ਪੀਣ, ਪਹਿਨਣ, ਉਠਣ, ਬੈਠਣ, ਸੋਚਣ ਆਦਿ, ਭਾਵ ਹਰ ਸਮੇਂ ਸੱਚ ਨੂੰ ਹੀ ਪਰਨਾਏ ਰਹਿਣਾ ਹੈ।ਜਿਥੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ, ਸੰਗਤ ਦਾ ਦਰਬਾਰ ਲਾਉਂਦੇ, ਬੱਚਿਆਂ ਅਤੇ ਵਡਿਆਂ ਨੂੰ ਗੁਰਮੁਖੀ ਲਿਪੀ ਵਿੱਚ ਕਿਤਾਬਾਂ ਲਿਖ ਕੇ ਦੇਂਦੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਪੜ੍ਹਨੀ ਸਿਖਾਂਦੇ, ਸਰੀਰਕ ਬਲਵਾਨਤਾ ਲਈ ਮੱਲ ਅਖਾੜੇ ਲਾਉਂਦੇ, ਉਥੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਸੰਗਤ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈਕੇ ਲੰਗਰ ਦੀ ਸੇਵਾ ਵਿੱਚ ਰੁੱਝੇ ਰਹਿੰਦੇ। ਇਸ ਤਰਾਂ ਸੰਗਤ ਵਿੱਚ ਤੀਂਵੀ ਦਾ ਮਾਨ, ਸਨਮਾਨ ਅਤੇ ਬਰਾਬਰਤਾ ਲਈ ਅਤੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਦੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਨੂੰ ਬੜਾ ਬੱਲ ਬਖਸ਼ਿਆ।ਸਮਾਜ ਦੀ ਉਚਾਈ ਮਾਪਣ ਦਾ ਸਹੀ ਪੈਮਾਨਾ ਇਸਤਰੀ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਦਰਜਾ ਹੈ।ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਧਰਮਾਂ ਵਿਚ ਇਸਤਰੀਆਂ ਨਾਲ ਵਿਤਕਰੇ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਰਹੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਆਪਣੀ ਗੋਲੀ,ਪੈਰ ਦੀ ਜੁੱਤੀ ਸਮਝ ਕੇ ਰੱਖਿਆ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ ਹੈ।ਪਰੰਤੂ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਦੇ ਬਾਨੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਇਸਤਰੀਆਂ ਨੂੰ ਮਰਦਾਂ ਬਰਾਬਰ ਸਤਿਕਾਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।ਸਮਾਜ ਵਿਚ ਇਸਤਰੀਆਂ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਤ ਅਜਿਹੀਆਂ ਪ੍ਰਥਾਵਾਂ ਦਾ ਖੰਡਨ ਕੀਤਾ ਹੈ ਜਿਹੜੀਆਂ ਕਿ ਇਸਤਰੀ ਨੂੰ ਗੁਲਾਮ ਕਰਦੀਆਂ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਗੁਰੂ ਸਹਿਬਾਨ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਗੁਰੂ ਮਹਿਲਾਂ ਦੀ ਵੀ ਨਿਵੇਕਲੀ ਦੇਣ ਰਹੀ ਹੈ।ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਸਮੇਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੁਪਤਨੀ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਭੇਦ ਭਾਵ,ਊਚ ਨੀਚ ਦੇ ਵਿਤਕਰੇ ਤੋਂ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਅਜਿਹੇ ਪਹਿਲੇ ਸਿੱਖ ਇਸਤਰੀ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜਿਕਰ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦਾ ਹੈ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਦਾ ਜੀ ਜਨਮ ਖਡੂਰ ਦੇ ਨੇੜੇ ਸੰਘਰ ਪਿੰਡ ਵਿਖੇ ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਖੱਤਰੀ ਦੇ ਘਰ ਹੋਇਆ। ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਜੀ ਇਕ ਵੱਡੇ ਹਟਵਾਣੀਏ ਤੇ ਸ਼ਾਹੂਕਾਰ ਸਨ। ਮਾਈ ਵੀਰਾਈ , ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਚੌਧਰੀ ਤੱਖਤ ਮੱਲ, ਮੱਤੇ ਦੀ ਸਰਾਂ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਸਪੁੱਤਰੀ ਸਨ, ਨੇ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦਾ ਰਿਸ਼ਤਾ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨਾਲ ਪੱਕਾ ਕਰਾ ਦਿੱਤਾ। ਮਹਾਨਕੋਸ਼ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦਾ ਵਿਆਹ ਸੰਨ 1519ਈ: ਵਿਚ ਹੋਇਆ। ਕੁਝ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਚੌਧਰੀ ਤੱਖ਼ਤ ਮੱਲ ਨੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਦੇ ਪਿਤਾ ਬਾਬਾ ਫੇਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਵੱਖਰਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਜੀ ਬਾਬਾ ਫੇਰੂ ਤੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਸੰਘਰ ਵਿਖੇ ਹੀ ਲੈ ਆਏ। ਬਾਬਾ ਫੇਰੂ ਜੀ ਨੇ ਹਰੀਕੇ ਪੱਤਣ ਦੁਕਾਨ ਪਾ ਲਈ ।ਛੇਤੀ ਹੀ ਆਪ ਜੀ ਖਡੂਰ ਮੁੜ ਆਏ ਤੇ ਸ਼ਾਹੂਕਾਰਾ ਕਰਨ ਲੱਗੇ ਅਤੇ ਨਾਲ ਦੁਕਾਨ ਵੀ ਰੱਖੀ। 1526 ਈ: ਨੂੰ ਬਾਬਾ ਫੇਰੂ ਜੀ ਚੜਾਈ ਕਰ ਗਏ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਾਰਾ ਕੰਮ-ਕਾਜ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੇ ਸੰਭਾਲ ਲਿਆ। ਬਾਬਾ ਫੇਰੂ ਜੀ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਦੇਵੀ ਭਗਤ ਸਨ, ਸਗੋਂ ਹਰ ਸਾਲ ਪਹਾੜਾਂ ਵਾਲੀ ਦੇਵੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਜੱਥਾ ਵੀ ਲੈ ਜਾਂਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਉਸ ਸੰਗ ਦੇ ਜਥੇਦਾਰ ਵੀ ਸਨ। ਪਿਤਾ ਜੀ ਚਲ੍ਹਾਣੇ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਿੱਥੇ ਘਰ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਉਹਨਾਂ ਉੱਤੇ ਪਈ, ਉਥੇ ਸੰਗ ਨੂੰ ਲੈ ਜਾਣ ਦੀ ਜਥੇਦਾਰੀ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਿਰ ਆਈ। ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਕਈ ਸਾਲ ਉਸ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਰਹੇ। ਇਕ ਵਾਰੀ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਵਿਖੇ ਹੀ ਭਾਈ ਜੋਧ ਜੀ ਦੇ ਮੂੰਹੋਂ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ਸੁਣ ਕੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਜਾਣ ਦੀ ਵਿਚਾਰ ਬਣਾਈ।ਸੰਗ ਦੇ ਸਾਥੀਆਂ ਨੂੰ ਰਾਹ ਵਿਚ ਛੱਡ ਕੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਆਏ ਤੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰ ਕੇ ਉਥੇ ਹੀ ਟਿਕਣ ਦਾ ਮਨ ਬਣਾ ਲਿਆ। ਭਾਈ ਦਾਸੂ ਜੀ ਤੇ ਬੀਬੀ ਅਮਰੋ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ਹੋ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ। ਜਦੋਂ ਜੱਥਾ ਜੰਮੂ ਤੋਂ ਪਹਾੜ ਵਾਲੀ ਦੇਵੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰ ਖਡੂਰ ਮੁੜ ਆਇਆ ਤਾਂ ਆ ਕੇ ਕਿਸੇ ਨੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ‘ਤੇਰਾ ਪਤੀ, ਤੇਰਾ ਸਾਥ ਛੱਡ ਕੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਦਾ ਹੋ ਗਿਆ। ਠੰਢੇ ਸੁਭਾਓ ਦੀ ਮੂਰਤ ਖੀਵੀ ਅਡੋਲ ਰਹੀ।ਜਦੋਂ ਸਾਰਿਆਂ ਲਾ-ਲਾ ਕੇ ਗੱਲਾਂ ਕੀਤੀਆਂ ਤੇ ਕਿਹਾ, “ਲਹਿਣਾ` (ਜੀ) ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਹੀ ਨਾਨਕ ਦੇ ਪਾਸ ਰਹਿ ਪਿਆ, ਸੰਗ ਨੂੰ ਜਵਾਬ ਦੇ ਦਿੱਤਾ। ਆਪ ਸਾਧ ਹੋ ਕੇ ਬੈਠ ਗਿਆ ਤੇ ਤਪੇ (ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਜੀ) ਦੇ ਦੁਆਰੇ ਹੀ ਧੂਣੀ ਰਮਾ ਲਈ ਹੈ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਸਿਰਫ਼ ਇਹ ਹੀ ਆਖਿਆ ਜਿਥੇ ਉਹ ਜਿਸ ਹਾਲ ‘ਚ ਮੈਨੂੰ ਰੱਖੇਗਾ, ਉਸ ਹਾਲ ‘ਚ ਹੀ ਰਹਾਂਗੀ।’ ਜਦੋਂ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਤੋਂ ਘਰ ਖਡੂਰ ਦੀ ਸਾਰ ਲੈਣ ਲਈ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਤਾਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਸਾਫ਼ ਦੇਖ ਲਿਆ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਦਿਲ ਘਰ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਲੱਗਦਾ ਤੇ ਦੁਕਾਨ ਦਾ ਸਾਰਾ ਕੰਮ ਵੀ ਆਪਣੇ ਭਣੇਵੇਂ ਨੂੰ ਸੌਂਪ ਰਹੇ ਹਨ ਤੇ ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਸਿਰਫ ਇਨ੍ਹਾਂ ਹੀ ਕਿਹਾ “ਬਾਹਰ ਨਾ ਜਾਓ, ਘਰ ਰਹਿ ਜੋਗ ਕਮਾਓ, ਜਿਵੇਂ ਤੁਸੀਂ ਆਖੋਗੇ ਮੈ ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੀ ਤੁਰਾਂਗੀ,ਤੁਹਾਡੇ ਤਪ ਵਿੱਚ ਮੈ ਕਦੇ ਰੋੜਾ ਨਹੀਂ ਬਣਦੀ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ‘ਜਿਸ ਕੋਲ ਮੈਂ ਚਲਿਆ ਹਾਂ, ਉਹ ਜੋਗੀ, ਜੰਗਮ, ਸੰਨਿਆਸੀ ਸਰੇਵੜਾ ਨਹੀਂ, ਉਸ ਨੇ ਗ੍ਰਹਿਸਤ ਵਿੱਚ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਰਾਹ ਦਿਖਾਇਆ ਹੈ।’ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਕਿਸੇ ਪ੍ਰਕਾਰ ਤੋਂ ਨਾ ਰੋਕਿਆ। ਬੱਚੇ ਭਾਵੇਂ ਬਹੁਤ ਛੋਟੇ ਸਨ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਾਰਾ ਭਾਰ ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸਿਰ ਉੱਤੇ ਚੁੱਕ ਲਿਆ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੀ ਇਹ ਕੁਰਬਾਨੀ ਕੋਈ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਸੀ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਉਸ ਸਮੇਂ ਇਹ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਤਾ ਕਿ ‘ਦੀਨ-ਦੁਨੀ’ ਦਾ ਛਤਰ ਉਸੇ ਦੇ ਪਤੀ ਉੱਤੇ ਝੂਲਣਾ ਹੈ।ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਜੀ ਕੋਲ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਭੇਜਦੇ ਸਨ। ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੀ ਹਰ ਪ੍ਰੀਖਿਆ ਵਿਚੋਂ ਖਰੇ ਉਤਰੇ।ਗੁਰੂ ਪਦਵੀ ਸੌਂਪ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਲਹਿਣੇ ਤੋਂ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ।ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਦਾਤ ਲੈ ਕੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਖਡੂਰ ਮੁੜ ਆਏ।ਮਾਤਾ ਜੀ ਦਾ ਸੁਭਾਅ ਵੀ ਬਹੁਤ ਮਿੱਠਾ ਸੀ। ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿਚ ਰਹਿੰਦਿਆਂ ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਨਾਲ ਗੁੱਸਾ ਗਿਲਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ, ਸਗੋਂ ਮਿੱਠਾ ਬੋਲ ਕੇ ਸਭ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਵਲ ਕਰ ਲੈਂਦੇ। ਕਿਸੇ ਦੀ ਹਿੰਮਤ ਨਾ ਹੁੰਦੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੁਭਾਅ ਅੱਗੇ ਕੋਈ ਬੋਲ ਸਕੇ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੀ ਦੋਹਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਬੜੇ ਵਧੀਆ ਢੰਗ ਨਾਲ ਨਿਭਾ ਰਹੇ ਸਨ। ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਨੂੰ ਭੇਟ ਕੀਤੀ ਮਾਇਆ ਆਪਣੇ ਨਿੱਜੀ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਕਦੇ ਵਰਤਣ ਨਾ ਦਿੱਤੀ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪ ਘਰੋਂ ਅਣ-ਚੋਪੜੀ ਰੋਟੀ ਪਕਾ ਕੇ ਲਿਆਉਂਦੇ ਤੇ ਪੁੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਦੁਕਾਨ ਸਾਂਭਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਕਰਦੇ।ਭੇਟਾ ਨੂੰ ਨਿੱਜ ਲਈ ਵਰਤਣਾ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਠੀਕ ਨਹੀਂ ਸਮਝਦੇ ਸਨ।ਜੋ ਕੁਝ ਆਉਂਦਾ, ਲੰਗਰ ਵਿਚ ਪੈਂਦਾ। ਲੰਗਰ ਵਿਚ ਖੀਰ, ਕੜਾਹ,ਸਭ ਕੁਝ ਬਣਦਾ ਪਰ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਉਹ ਕੁਝ ਖਾਂਦੇ, ਜੋ ਮਾਤਾ ਜੀ ਘਰੋਂ ਪਕਾ ਕੇ ਲਿਆਉਂਦੇ।ਤਾਰੀਖ਼-ਇ-ਪੰਜਾਬ ਕ੍ਰਿਤ ਕਨ੍ਹਈਆ ਲਾਲ ਵਿਚ ਵੀ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਕਿ ਗੁਰੂ ਜੀ ਆਪਣੇ ਹੱਥਾਂ ਨਾਲ ਮਿਹਨਤ ਕਰਦੇ ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਆਮਦਨੀ ਨਾਲ ਭੋਜਨ ਖਾਂਦੇ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਬੱਚੀਆਂ ਨੂੰ ਘਰੇ ਪਰਿਵਾਰ ਸਾਂਭਣ ਦੇ ਨਾਲ ਕੋਲ ਬਿਠਾ ਕੇ ਬਾਣੀ ਵੀ ਯਾਦ ਕਰਾਈ। ਐਸੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦਿੱਤੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਦੇ ਨਾ ਵਿਸਾਰੀ ।ਭਾਈ ਬਲਵੰਡ ਜੀ ਦੀ ਵਾਰ ਅਨੁਸਾਰ,’ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੇ ਪਤੀ ਵਾਂਗ ਬਹੁਤ ਭਲੇ ਹਨ, ਮਾਤਾ ਜੀ ਦੀ ਛਾਂ ਬਹੁਤ ਪੱਤ੍ਰਾ ਵਾਲੀ ਸੰਘਣੀ ਹੈ।ਜਿਵੇਂ ਮਾਂ ਦੀ ਠੰਢੀ ਛਾਂ ਹੈ,ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸ ਬੈਠਿਆਂ ਵੀ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸ਼ਾਂਤੀ ਤੇ ਠੰਢ ਪੈਂਦੀ ਹੈ।ਬਲਵੰਡ ਖੀਵੀ ਨੇਕ ਜਨ ਜਿਸ ਬਹੁਤੀ ਛਾਉ ਪਤ੍ਰਾਲੀ।।ਬੀਬੀ ਅਮਰੋ ਜੀ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੀ ਸਪੁੱਤਰੀ ਸੀ ,ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬਾਣੀ ਬਹੁਤ ਕੰਠ ਸੀ।ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਿੱਤ ਉਠ ਬਾਣੀ ਪੜ੍ਹਨ ਕਾਰਨ ਹੀ ਭਾਈ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੀ ਖਿੱਚ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਦੀ ਹੋਈ।ਮਨ ਨੂੰ ਅਜਿਹੀ ਚੋਟ ਲੱਗੀ ਕਿ ਬੀਬੀ ਅਮਰੋ ਜੀ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿਚ ਆਏ । ਫਿਰ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਹੋ ਗਏ ਤੇ ਐਸੀ ਘਾਲ ਘਾਲੀ ਕਿ ‘ਪਿਉ ਦਾਦੇ ਜੇਵੇਹਾ ਪੋਤਾ ਪ੍ਰਵਾਨ ਹੋਆ’।ਜੇਕਰ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਨਜ਼ਰ ਮਾਰੀਏ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਨੂੰ ਸਿੱਖੀ ਵਲ ਪ੍ਰੇਰਨ ਦਾ ਮਾਣ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਹੀ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।ਮਾਂ ਦੇ ਦੁੱਧ ਅਤੇ ਗੁੜ੍ਹਤੀ ਨੇ ਇਹ ਚਮਤਕਾਰ ਦਿਖਾਇਆ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਕਦੇ ਅੱਖਾਂ ਤੋਂ ਓਹਲੇ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ।ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਆਪਣੀ ਸੰਤਾਨ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਕੀਲ ਕੇ ਰੱਖਦੀ ਸੀ। ਇਸ ਦੀ ਇਕ ਉਦਾਹਰਣ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਹੈ, ਜਦੋ ਘੋੜੀ ਤੇ ਸਵਾਰ ਹੋ ਦਾਸੂ ਜੀ ਨੇ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦਾ ਪਿੱਛਾ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਨੂੰ ਜਦ ਦਾਤੂ ਜੀ ਤੇ ਦਾਸੂ ਜੀ ਵਲੋਂ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੂੰ ਬਾਸਰਕੇ ਰਾਹ ਵਿਚ ਘੇਰ ਲੈਣ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਮਿਲੀ ਤਾਂ ਆਪ ਜੀ ਉਸ ਸਮੇਂ ਤੁਰ ਕੇ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਪਾਸ ਗਏ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਿਮਰਤਾ ਵਿਚ ਭਿੱਜ ਜੋ ਸ਼ਬਦ ਆਖੇ, ਉਹ ਸ਼ਬਦ ਹਰ ਮਾਂ ਨੂੰ ਸਦਾ ਚੇਤੇ ਰੱਖਣੇ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ।ਇਥੇ ਇਹ ਵੀ ਯਾਦ ਰਵੇ ਕਿ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਉਸ ਸਮੇਂ ਅਜੇ ਗੁਰੂ ਨਹੀਂ ਸਨ ਬਣੇ । ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ ਬਾਸਰਕੇ ਦੇਖ ਕੇ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ਤੁਸਾਂ ਕਿਉਂ ਖੇਚਲ ਕੀਤੀ, ਮੈਨੂੰ ਬੁਲਾ ਲੈਣਾ ਸੀ” । ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇ ਘਰ ਦੀ ਦੌਲਤ ਹੀ ਗਰੀਬੀ ਹੈ, ਨਿਮਰਤਾ ਹੈ । ਮੈਂ ਦੋਵੇਂ ਬੱਚੇ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਆਈ ਹਾਂ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਚੁੱਕ ‘ਚਆਪ ਜੀ ਦੀ ਬੇਅਦਬੀ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਆਪ ਜੀ ਨੂੰ ਘੇਰਿਆ ਹੈ । ਆਪ ਮਿਹਰ ਕਰੋ, ਭੁੱਲਣਹਾਰ ਜਾਣ ਕੇ ਤੇ ਆਪਣੇ ਸਮਝ ਕੇ ਬਖ਼ਸ਼ ਦਿਓ ਨੇ । ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ “ਬਖ਼ਸ਼ਸ਼ ਦਾਤਾ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਹੀ ਹਨ ਤਾਂ ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਹੋਰ ਨਿਮਰ ਹੋ ਕੇ ਕਿਹਾ, “ਮੈਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਅਪਰਾਧ ਬਖ਼ਸ਼ਣ ਯੋਗ ਨਹੀਂ, ਮਿਹਰ ਕਰ ਦਿਓ ਨੇ । ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਤੇ ਧੰਨ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਕਹਿ ਕੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਛਾਤੀ ਨਾਲ ਲਗਾ ਲਿਆ। ਫਿਰ ਜਦ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੂੰ, ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੂੰ ਗੁਰਗੱਦੀ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦੇਣ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਦਿੱਤੀ ਤਾਂ ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਖੁਸ਼ੀ ਮਨਾਈ।ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ਸਾਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਰਾਜ਼ੀ ਹੋ । ਪੁੱਤਰਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਵੀਚਾਰੋ । ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਪੁੱਤਰਾਂ ਦੇ ਸੰਬੰਧ ਵਿਚ ਕਿਹਾ, “ਪੁੱਤਰ ਪੁੱਤਰਪੁਣੇ ਵਿਚ ਹਨ, ਤੁਸੀਂ ਹੀ ਮਿਹਰ ਕਰੋ । ਮਾਤਾ ਜੀ ਦੋਵੇ ਪੁੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਰਹੇ । ਬੜੇ ਮਿੱਠੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਹਿੰਦੇ ਕਿ ਇਹ ਮੇਰੀ ਜਾਂ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਾਰਸ਼ ਦੀ ਗੱਲ ਨਹੀਂ, ਕਿਸੇ ਦੇ ਹੱਥ ਕੁਝ ਨਹੀਂ, ਸਭ ਕੁਝ ਕਰਤਾਰ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹੈ।ਕਹਿ ਕਾਹੂ ਕੇ ਕਰ ਬਿਥੈ, ਸਭ ਕਰਤਾਰ ਅਧੀਨੈ ॥ਭਾਈ ਕੇਸਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਬੰਸਾਵਲੀਨਾਮਾ ਵਿਚ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਕਿਮਾਤਾ ਜੀ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਕਿ , ‘ਪੰਡ ਭਾਰੀ ਹੈ, ਤੁਸਾਂ ਤੇ ਚੁਕੀ ਨਾ ਜਾਸੀ । ਇਹ ਚੁਕੇਗਾ ਸਾਰੀ ।ਛੇ ਮਹੀਨੇ ਤੱਕ ਮਾਤਾ ਜੀ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਰਹੇ।ਦੋਵੇਂ ਪੁੱਤਰਾਂ ਚੋਂ ਗੱਦੀ ਕਿਸ ਨੂੰ ਨਾ ਮਿਲਣ ਦਾ ਰੋਸ ਹੋਇਆ।ਦਾਸੂ ਜੀ ਗੁਰਗੱਦੀ ਜਾ ਬੈਠੇ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਿਰ ਫਿਰ ਗਿਆ।ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਦੋਂ ਭਰੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿਚ ਦਾਤੂ ਜੀ ਨੇ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੂੰ ਲੱਤ ਮਾਰੀ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਨੇ ਉਸ ਦੇ ਪੈਰ ਪਕੜ ਲਏ ਤੇ ਕਿਹਾ ” ਤੁਹਾਡੇ ਚਰਨ ਕੋਮਲ ਤੇ ਮੇਰੇ ਹੱਡ ਕਰੜੇ’ ਹਨ ਇਹ ਆਖ ਕੇ ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਖਿਮਾ ਦੀ ਹੱਦ ਦੱਸੀ। ਅਹੰਕਾਰੀ ਦਾਤੂ ਦਾ ਪੈਰ ਪੀੜਾ ਨਾਲ ਐਸਾ ਵਿਗੜਿਆ ਕਿ ਪਿਛੋਂ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਜੀ ਦੀ ਚਰਨ-ਛੁਹ ਨਾਲ ਹੀ ਠੀਕ ਹੋ ਸਕਿਆ।ਪੈਰ ਵਿਚ ਪੀੜ ਉਠਣ ’ਤੇ ਵੀ ਮਾਂ ਦਾ ਹਿਰਦਾ ਪਿਘਲਿਆ ਨਹੀਂ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾਤੂ ਦਾ ਸਾਥ ਨਾ ਦਿੱਤਾ । ਉਹ ਮਨਮੁਖ ਦਾ ਸਾਥ ਕਿਵੇਂ ਦੇ ਸਕਦੇ ਸਨ।ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਮਾਤਾ ਜੀ ਲੰਗਰ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕਰਦੇ ਰਹੇ । ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲੰਗਰ ਜਾਰੀ ਰਹਿਆ । ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਵੇਲੇ ਲੰਗਰ ਵਿਚ ਨਿੱਤ ਘਿਉ ,ਮੈਦਾ ਪੱਕਦਾ ਤੇ ਰਬਾਬੀ ਸੱਤਾ ਜੀ ਨੇ ਫਿਰ ‘”ਨਿਤ ਰਸੋਈ ਤੇਰੀਐ, ਘਿਉ ਮੈਦਾ ਖਾਣ” ਦੀ ਧੁਨੀ ਉਠਾਈ ।ਭਾਵੇਂ ਮਾਤਾ ਜੀ ਕਾਫ਼ੀ ਬਿਰਧ ਹੋ ਗਏ ਸਨ ਪਰ ਲੰਗਰ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਰਦੇ । ਜਦੋ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵੱਸਿਆ ਤਾਂ ਆਪ ਜੀ ਕੁਝ ਚਿਰ ਉੱਥੇ ਵੀ ਆ ਕੇ ਸੇਵਾ ਕਰਦੇ ਰਹੇ । ਸੰਨ 1582 ਵਿਚ ਆਪ ਜੀ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਹੀ ਅਕਾਲ ਚਲਾਣਾ ਕਰ ਗਏ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਆਪ ਆ ਕੇ ਹੱਥੀਂ ਸਸਕਾਰ ਕੀਤਾ। ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਜੋ ਸੇਵਾ ਦੀ ਰੀਤ ਚਲਾਈ, ਉਹ ਹੁਣ ਤੱਕ ਚੱਲਦੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ । ਜੇ ਪਹਿਲੀ ਸਿੱਖ ਬੇਬੇ ਨਾਨਕੀ ਸੀ ਤਾਂ ਪਹਿਲੀ ਸੇਵਿਕਾ ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਸਨ।

ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ, (1506 - 1582 ਈ.) By Vnita kasnia punjab. ਮਾਤਾ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ਸੰਨ 1506 ਈ: ਵਿੱਚ ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਖੱਤਰੀ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ, ਮਾਤਾ ਕਰਮ ਦੇਵੀ ਦੀ ਕੁੱਖੋਂ ਹੋਇਆ। ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਓਸ ਸਮੇਂ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਨੱਗਰ ਸੰਘਰ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਹੁਣ ਇਹ ਨੱਗਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਤਰਨਤਾਰਨ ਵਿੱਚ ਹੈ। ਭਾਈ ਦੇਵੀ ਚੰਦ ਇਕ ਦੁਕਾਨਦਾਰ ਸਨ ਅਤੇ ਛੋਟੇ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਸ਼ਾਹੂਕਾਰੇ ਦਾ ਕੰਮ ਵੀ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਬਚਪਨ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸਾਊ, ਮਿਠਬੋਲੜਾ ਅਤੇ ਮਸਤ ਸੁਭਾਅ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਨੇ ਆਪਣੀ ਬੱਚੀ ਦਾ ਨਾਮ ਖੀਵੀ ਰੱਖਿਆ। ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੇ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਧਾਰਮਿਕ ਬਿਰਤੀ ਵਾਲੇ ਵਿਅਕਤੀ ਸਨ ਅਤੇ ਦੇਵੀ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਸਨ।ਬਾਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਦੇ ਧਾਰਮਿਕ ਜੀਵਨ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਬੀਬੀ ‘ਤੇ ਪੈਣਾ ਕੁਦਰਤੀ ਸੀ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਾਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਹੀ ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਜੀ ਨੇ ਸੰਤੋਖ, ਸੰਜਮ ਅਤੇ ਸੱਚ ਦੇ ਸ਼ੁਭ ਗੁਣ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰ ਲਏ ਸਨ। ਬੀਬੀ ਖੀਵੀ ਜੀ ਦੁਕਾਨ ਉੱਤੇ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਨਾਲ ਕੰਮ ਵਿੱਚ ਹਥ ਵਟਾਂਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਘਰ-ਪਰਵਾਰ ਵਿੱਚ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਸਮੇਂ ਨਿਤ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸ ਬੈਠਦੇ ਸਨ। ਬੀਬੀ ਵਿਰਾਈ ਜੀ (ਜਾਂ ਬੀਬੀ ਭਰਾਈ ਜੀ) ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਸ਼ਰਦਾਲੂ ਸਨ। ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ ਵੀ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਨ ਅਤੇ ਇਕ ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਪਾਸ ਨੌਕਰੀ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਬੀਬੀ ਵਿਰਾਈ ਜੀ ਦੇ ਭਾਈ ਫੇਰੂ ਮੱਲ...

ਮਾਤਾ ਭਾਗ ਭਰੀ ਜੀ ਸ੍ਰੀ ਨਗਰ ,By Smajsevi Vnita Kasnia Punjab ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਸ੍ਰੀ ਨਗਰ ਦੀ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ । ਇਸ ਦਾ ਲੜਕਾ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਕਟੜ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਗੁਰੂ ਦਾ ਸਿੱਖ ਬਣ ਗਿਆ । ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਬਹੁਤ ਬਿਰਧ ਸੀ ਅੱਖਾਂ ਦੀ ਨਿਗਾਹ ਚਲੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਪਾਸੋਂ ਸੁਣਿਆ ਕਿ ਗੁਰੂ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੂੰ ਜਿਹੜਾ ਸੱਚੇ ਦਿਲੋਂ ਯਾਦ ਕਰੇ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਤੇ ਸ਼ਰਧਾ ਰੱਖੇ ਤਾਂ ਉਹ ਆਪ ਕੇ ਘਰ ਦਰਸ਼ਨ ਦੇਂਦੇ ਹਨ । ਮਾਈ ਜੀ ਇਹ ਗੱਲ ਸੁਣ ਇਕ ਗਰਮ ਚੋਲਾ ਤਿਆਰ ਕਰ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨ ਲੱਗੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਿਲ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀਆਂ ਤਾਰਾਂ ਖੜਕੀਆਂ ਮਾਈ ਤੋਂ ਚੋਲਾ ਆਣ ਮੰਗਿਆ ਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਉਸ ਕਈਆਂ ਵਰਿਆਂ ਦੀ ਜਾ ਚੁੱਕੀ ਨਜ਼ਰ ਵਾਪਸ ਪਰਤ ਆਈ । ਮਾਈ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਸੱਦ ਲਿਆ । ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਤਿਬਤ ਪ੍ਰਚਾਰ ਲਈ ਗਏ ਤਾਂ ਆਪ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੀ ਵਾਦੀ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕੀਤਾ । ਹੁਣ ਇਹ ਦੂਜੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਸਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਸ ਪਾਸੇ ਪਰਚਾਰ ਯਾਤਰਾ ਆਰੰਭ ਕੀਤੀ । ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਵੀ ਕਸ਼ਮੀਰ ਤੱਕ ਮੰਜੀਆਂ ਸਥਾਪਤ ਕਰਕੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕੀਤਾ ਸੀ । ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਵੇਲੇ ਦੋ ਕਟੜ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਘਰੋਂ ਬਨਾਰਸ ਵਿਦਿਆ ਹਾਸਲ ਕਰਨ ਲਈ ਤੁਰੇ ਤਾਂ ਸ੍ਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਆ ਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤੇ । ਏਥੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੁਖਮਨੀ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪਾਠ ਸੁਣਿਆ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾ ਹੋ ਗਈ । ਏਨੇ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਹੋਏ ਕਿ ਬਨਾਰਸ ਜਾਣ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਛੱਡ ਸਿੱਖੀ ਧਾਰਨ ਕਰ ਲਈ । ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਕ ਕਟੂ ਸ਼ਾਹ ਨਾਮੀ ਮੁਸਲਮਾਨ ਤੋਂ ਸਿੱਖ ਬਣਿਆ ਸੀ । ਤਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੁਆਰਾ ਕਸ਼ਮੀਰ ਵਿਚ ਸਿੱਖੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਫੁੱਲਤ ਰਖਿਆ ਇਥੇ ਇਕ ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਦੀ ਮਾਤਾ ਦੇ ਪਿਆਰ ਸਦਕਾ ਗੁਰੂ ਜੀ ਕਸ਼ਮੀਰ ਵਲ ਖਿਚੇ ਗਏ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਲਾਹੌਰ ਤੋਂ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਤਾਰਦੇ ਸਿਆਲਕੋਟ ਪੁੱਜੇ । ਇਹ ਪੁਰਾਣਾ ਵਿਦਵਾਨਾਂ ਦਾ ਸ਼ਹਿਰ ਕਰਕੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੀ । ਇਥੇ ਵਿਦਵਾਨ , ਔਲੀਏ , ਫ਼ਕੀਰ ਤੇ ਸੰਤ ਉਚੇਚਾ ਮੌਲਵੀ ਅਬਦੁੱਲ ਹਕੀਮ ਆਦਿ ਆਪ ਨੂੰ ਮਿਲੇ । ਬੜੀਆਂ ਵਿਚਾਰ ਗੋਸ਼ਟੀਆਂ ਹੋਈਆਂ । ਚਾਪਰਨਲਾ ’ ਪਿੰਡ ਦੇ ਲਾਗੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਇਕ ਬਾਹਮਣ ਅਚਾਨਕ ਮਿਲ ਪਿਆ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪੁਛਿਆਂ ਕਿ “ ਏਥੇ ਕਿਥੇ ਪੀਣ ਤੇ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰਨ ਲਈ ਪਾਣੀ ਮਿਲੇਗਾ ? " ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਬੜੀ ਬੇਰੁੱਖੀ ਤੇ ਹੈਂਕੜ ਵਿਚ ਕਿਹਾ , “ ਏਥੋਂ ਪੱਥਰਾਂ ਚੋਂ ਕਿਥੋਂ ਪਾਣੀ ਲਭਦੇ ਹੋ ? ਗੁਰੂ ਜੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪੱਥਰਾਂ ਵਿੱਚ ਨੇਜਾ ਖੋਭਿਆ ਤਾਂ ਪਾਣੀ ਦਾ ਫਵਾਰਾ ਚਲ ਪਿਆ । ਬਾਹਮਣ ਫਵਾਰਾ ਫੁਟਿਆ ਵੇਖ ਸ਼ਰਮਿੰਦਾ ਜਿਹਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਪਾਸੋਂ ਮਾਫੀ ਮੰਗੀ ਤੇ ਕਿਹਾ ਕਿ “ ਮਹਾਰਾਜ ਤੁਹਾਡੀ ਮਹਾਨਤਾ ਨੂੰ ਮੈਂ ਪਛਾਣ ਨਹੀਂ ਸਕਿਆ । ਮੈਨੂੰ ਖਿਮਾ ਬਖਸ਼ੋ । ” ਇਸ ਫਵਾਰੇ ਤੋਂ ਇਕ ਬੜਾ ਸੁੰਦਰ ਸਰੋਵਰ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਜਿਸ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਸਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਦੀ ਬਿਰਧ ਮਾਤਾ ਅੱਖਾਂ ਤੋਂ ਅੰਨੀ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਸੀ । ਜਦੋਂ ਘਰ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਸੁਣਦੀ ਤਾਂ ਉਸ ਦਾ ਜੀ ਵੀ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ ਨੂੰ ਦਿਲ ਕਰਦਾ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਨਾ ਕੋਈ ਸਿੱਧਾ ਰਾਹ ਨਾ ਕੋਈ ਗੱਡੀ ਮੋਟਰ ਹੁੰਦੀ ਸੀ ਤਗੜੇ ਪੁਰਸ਼ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਮੇਲੇ ਕਰ ਆਇਆ ਕਰਦੇ ਸਨ । ਇਕ ਦਿਨ ਭਾਈ ਮਾਧੋ ਜੀ ਵੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਘਰ ਆਏ ਹੋਏ ਸਨ । ਗੱਲਾਂ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ ਕਿ ਗੁਰੂ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਪਿਆਰ ਤੇ ਸ਼ਰਧਾ ਦੀ ਬੜੀ ਕਦਰ ਕਰਦੇ ਜਿਹੜਾ ਸਿੱਖ ਜਾਂ ਕੋਈ ਸੱਚੇ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਯਾਦ ਕਰਦੈ ਉਸ ਨੂੰ ਆ ਦਰਸ਼ਨ ਦੇਂਦੇ ਹਨ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਆਪਸੀ ਗੱਲਾਂ ਸੁਣ ਮਾਈ ਭਾਗ ਨੇ ਵੀ ਸੋਚਿਆ ਮੈਂ ਵੀ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਸੱਚੇ ਦਿਲ ਨਾਲ ਯਾਦ ਕਰਾਂ ਤਾਂ ਉਹ ਜਰੂਰ ਆਉਣਗੇ । ਇਹ ਸੋਚ ਉਸ ਨੇ ਚੰਗੀ ਉਨ ਮੰਗਾਈ ਧੋ ਕੇ ਸਾਫ ਕਰ ਬਰੀਕ ਕੱਤੀ । ਫਿਰ ਦੋਹਰੀ ਕੀਤੀ ਤੇ ਕੱਤੀ । ਇਸ ਤਰਾਂ ਕਰਦਿਆਂ ਹਰ ਸਮੇਂ ਸੱਚੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਦੀ ।ਹੌਲੀ - ਹੌਲੀ ਸਲਾਈਆਂ ਨਾਲ ਉਣਨਾਂ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ । ਰੋਜ਼ ਉਣਦਿਆਂ ਵੀ ਗੁਰੂ ਜੀ ਵਲ ਧਿਆਨ ਕਰਕੇ ਸੋਚਾਂ ਵਿੱਚ ਡੁੱਬ ਕਹਿਣਾ । “ ਮੈਂ ਅੰਨੀ ਦੇ ਭਾਗ ਕਿਥੋਂ ਕਿ ਮੈਂ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਾਂ । ਜੇ ਉਹ ਆ ਵੀ ਗਏ ਮੈਥੋਂ ਬਦ ਕਿਸਮਤ ਪਾਸੋਂ ਕਿਹੜਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਚਿਹਰਾ ਵੇਖਿਆ ਜਾਣਾ ਹੈ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰੋਜ਼ ਕਰਦਿਆਂ ਉਸ ਇੱਕ ਸੁੰਦਰ ਗਰਮ ਚੋਲਾ ਸੀਤਾ - ਧੋਤਾ ਤੇ ਜੋੜ ਦੇ ਸੰਦੂਕ ਵਿਚ ਰੱਖ ਲਿਆ ਕਿ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਦੋਂ ਆਉਣਾ ਹੈ । ਇਕ ਦਿਨ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਗੁਰੂ ਜੀ ਪੰਜਾਬ ਤੋਂ ਕਸ਼ਮੀਰ ਵੱਲ ਚੱਲ ਪਏ ਹਨ । ਮਾਤਾ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿਚ ਉਛਲੀ ਚੋਲਾ ਸੰਦੂਕ ਵਿਚ ਕੱਢ ਪੁੱਤਰ ਨੂੰ ਦਿਖਾਉਂਦੀ ਹੈ । ਉਹ ਵੇਖ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਹੋਇਆ ।ਹੁਣ ਮਾਤਾ ਨੇ ਸਵੇਰੇ ਹੀ ਚੋਲਾ ਸੰਦੂਕ ਵਿੱਚੋਂ ਕੱਢ ਲਾਗੇ ਰੱਖ ਬੈਠ ਜਾਣਾ । ਰਾਤ ਫਿਰ ਸਾਂਭ ਕੇ ਸੰਦੂਕ ਵਿੱਚ ਰਖ ਦੇਣਾ । ਕਈ ਦਿਨ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲੰਘ ਗਏ । ਇਕ ਦਿਨ ਚੋਲਾ ਕੱਢ ਕੇ ਹੰਝੂਆਂ ਦੀ ਝੜੀ ਲਾ ਦਿੱਤੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀ ਉਡੀਕ ਵਿਚ ਭਾਵੁਕ ਹੋ ਕੇ ਬੋਲਣ ਲੱਗੀ , “ ਮੈਂ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿਹੋ ਜਿਹੀ ਪਾਪਣ ਹਾਂ ਜਿਹੜੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਅਜੇ ਨਹੀਂ ਬਹੁੜੇ ਖਬਰੇ ਮੇਰੇ ਸ਼ਰਧਾ ਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿਚ ਕੋਈ ਘਾਟ ਹੈ ਜਿਹੜੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਮੈਨੂੰ ਅੰਨੀ ਨੂੰ ਦੇਖਣਾ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਜੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਆ ਵੀ ਗਏ , ਮੈਂ ਅੰਨੀ ਕਿਵੇਂ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਾਂਗੀ । “ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਰਦੀ ਦੀ ਅੱਖ ਲਗ ਗਈ । ਮਾਤਾ ਦੇ ਘਰ ਸ਼ੋਰ ਮੱਚ ਗਿਆ | ਆਵਾਜ਼ਾਂ ਆ ਰਹੀਆਂ , ਸੱਚੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਆ ਗਏ । ਮਾਤਾ ਉਬੜ ਵਾਹੇ ਉਠੀ ਲਾਗੋ ਟਟੋਲ ਕੇ ਚੋਲਾ ਫੜਦੀ ਹੈ।ਉਧਰ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀ ਸੁੰਦਰ ਦਿਲ ਮੋਹਣੀ ਆਵਾਜ਼ ਆਈ ਹੈ “ ਮਾਤਾ ਤੇਰਾ ਚੋਲਾ ਲੈਣ ਆਇਆ ਹਾਂ ਮਾਤਾ ਦੇ ਕੰਨੀਂ ਪਈ ਕਪਾਟ ਖੁਲ ਗਏ । ਦਿਸਣ ਲਗ ਪਿਆ । ਚੋਲਾ ਭੁੱਲ ਹੀ ਗਿਆ ਗੁਰੂ ਜੀ ਚਰਨ ਪਕੜ ਸਿਰ ਚਰਨ ਤੇ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ ਗੁਰੂ ਜੀ ਮਾਈ ਨੂੰ ਗਲ ਨਾਲ ਲਾਇਆ ਤੇ ਮੁਖਾਰਬਿੰਦ ਤੋਂ ਫਿਰ ਕਿਹਾ “ ਮਾਈ ਚੋਲਾ ” ਤਾਂ ਮਾਤਾ ਨੇ ਮੰਜੇ ਤੋਂ ਚੋਲਾ ਲਿਆ ਕੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਇਸ ਨੂੰ ਗਲ ਪਾਉਣ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਹੋਰਾਂ ਮਾਈ ਦਾ ਪਿਆਰ ਤੇ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਭਿਜਿਆ ਚੋਲਾ ਗਲ ਪਾਇਆ ਬੜੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਹੱਸੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਬਚਨ ਕੀਤਾ “ ਧੰਨ ਮਾਤਾ ਭਾਗ ਭਰੀ ਧੰਨ ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ ਦੀ ਦੇਰ ਸੀ ਕਿ ਮਾਤਾ ਜੀ ਸੱਚਖੰਡ ਜਾ ਬਰਾਜੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਮਾਤਾ ਦਾ ਬਿਬਾਨ ਤਿਆਰ ਕਰ । ਆਪ ਚਿਖਾ ਤਿਆਰ ਕਰਵਾਈ ਆਪ ਅੰਤਮ ਅਰਦਾਸ ਕਰ ਕੇ ਦਾਗ ਦਿੱਤਾ । ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਭਾਗਾਂ ਭਰੀ ਕੋਈ ਵਿਰਲੀ ਹੀ ਔਰਤ ਹੋਵੇਗੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਅੰਤਮ ਵੇਲੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਆਣ ਦਰਸ਼ਨ ਦੇਣ ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਅੰਤਮ ਕਿਰਿਆ ਵੀ ਆਪ ਹੀ ਕੀਤੀ ਹੋਵੇਗੀ । ਜੋ ਇਹ ਭਾਗ ਭਰੀ ਹੀ ਭਾਗਾਂ ਵਾਲੀ ਸੀ ।ਜਿਸ ਦੇ ਸੱਚ ਸਿਦਕ ਪਿਆਰ ਤੇ ਸ਼ਰਧਾ ਦੇ ਕੀਲੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਸਿਧੇ ਵਾਟਾਂ ਮਾਰਦੇ ਪੁੱਜੇ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਸਤਾਰਵੀ ਤੇ ਆਪ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਸੀਸ ਤੇ ਦਸਤਾਰ ਬੰਨੀ । ਸੰਗਤਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਲਈ ਵਹੀਰਾਂ ਘੱਤੀਆਂ ਜਿੰਨੀ ਭੇਟਾ ਤੇ ਸੇਵਾ ਹਾਜ਼ਰ ਹੋਈ , ਉਸ ਦਾ ਇਥੇ ਮਾਈ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਇਕ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਤੇ ਲੰਗਰ ਚਾਲੂ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਹਾ । ਇਹ ਲੰਗਰ ਹੁਣ ਤੱਕ ਉਵੇਂ ਕਾਇਮ ਹੈ ਕਸ਼ਮੀਰੀ ਸਿੱਖਾਂ ਇਥੇ ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਤੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਏਥੇ ਪਧਾਰਨ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬਹੁਤ ਸੁੰਦਰ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ । ਮਹਿਮਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਵੀ ਲਿਖਿਆ ਹੈ : ਪੁਨ ਸਭ ਬਸਤਰ ਸਤਿਗੁਰ ਪਹਿਰਾਇ ॥ ਜੋ ਪ੍ਰੀਤ ਨਾਲ ਨਿਜ ਹਾਥ ਬਣਾਏ ॥ ਸੂਰਜ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੇ ਪੰਨਾ ੧੭੨੦ ਤੇ ਇਉਂ ਲਿਖਿਆ ਹੈ । ਧੰਨ ਜਨਮ ਬਿਰਧ ਕੋ ਕਹੈ ॥ ਜਿਸ ਕੀ ਮਮਤਾ ਜੋਗੀ ਹੈ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀਆ ਇਸ ਕੋ ਪਾਇ ਸਸਕਾਰਨਿ ਕੋ ਕੀਨਿ ਉਪਾਇ ॥੩੦ ॥ ਸੂਰਜ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਫਿਰ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਇਸ ਘਰ ਵਿਚ ਧਰਮ ਸਾਲ ਬਣ ਲੰਗਰ ਲਗ ਗਏ । ਦੇਗ ਚਲਾਵਿਨ ਲਾਗਿਓ ਤਹਾਂ । ਧਰਮਸਾਲ ਰਚਿ ਸੰਗਤ ਮਹਾਂ । ਇਹ ਅਸਥਾਨ ਕਾਠੀ ਦਰਵਾਜੇ ਅਸਥਿਤ ਹੈ । ਅਪਰ ਜਿਤਿਕ ਧੰਨ ਸੰਚੈ ਹੋਹਿ || ਸਤਿਗੁਰੂ ਢਿਗ ਪਹੁੰਚਾਵੈ ਸੋਹਿ ॥

ਮਾਤਾ ਭਾਗ ਭਰੀ ਜੀ ਸ੍ਰੀ ਨਗਰ , ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਸ੍ਰੀ ਨਗਰ ਦੀ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ । ਇਸ ਦਾ ਲੜਕਾ ਭਾਈ ਸੇਵਾ ਦਾਸ ਕਟੜ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਗੁਰੂ ਦਾ ਸਿੱਖ ਬਣ ਗਿਆ । ਮਾਈ ਭਾਗ ਭਰੀ ਬਹੁਤ ਬਿਰਧ ਸੀ ਅੱਖਾਂ ਦੀ ਨਿਗਾਹ ਚਲੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਪਾਸੋਂ ਸੁਣਿਆ ਕਿ ਗੁਰੂ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੂੰ ਜਿਹੜਾ ਸੱਚੇ ਦਿਲੋਂ ਯਾਦ ਕਰੇ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਤੇ ਸ਼ਰਧਾ ਰੱਖੇ ਤਾਂ ਉਹ ਆਪ ਕੇ ਘਰ ਦਰਸ਼ਨ ਦੇਂਦੇ ਹਨ । ਮਾਈ ਜੀ ਇਹ ਗੱਲ ਸੁਣ ਇਕ ਗਰਮ ਚੋਲਾ ਤਿਆਰ ਕਰ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨ ਲੱਗੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਿਲ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀਆਂ ਤਾਰਾਂ ਖੜਕੀਆਂ ਮਾਈ ਤੋਂ ਚੋਲਾ ਆਣ ਮੰਗਿਆ ਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਉਸ ਕਈਆਂ ਵਰਿਆਂ ਦੀ ਜਾ ਚੁੱਕੀ ਨਜ਼ਰ ਵਾਪਸ ਪਰਤ ਆਈ । ਮਾਈ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਸੱਦ ਲਿਆ ।  ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਤਿਬਤ ਪ੍ਰਚਾਰ ਲਈ ਗਏ ਤਾਂ ਆਪ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੀ ਵਾਦੀ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕੀਤਾ । ਹੁਣ ਇਹ ਦੂਜੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਸਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਸ ਪਾਸੇ ਪਰਚਾਰ ਯਾਤਰਾ ਆਰੰਭ ਕੀਤੀ । ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਵੀ ਕਸ਼ਮੀਰ ਤੱਕ ਮੰਜੀਆਂ ਸਥਾਪਤ ਕਰਕੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕੀਤਾ ਸੀ । ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਵੇਲੇ ਦੋ ਕਟੜ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਘਰੋਂ ਬਨਾਰਸ ਵਿਦਿਆ ਹਾਸਲ ਕਰਨ ਲਈ ਤੁਰੇ ਤਾਂ ਸ੍ਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਆ ਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤੇ । ਏਥੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੁਖਮਨੀ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪਾਠ ਸੁਣਿਆ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾ ਹੋ ਗਈ । ਏਨੇ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਹੋਏ ਕਿ ਬ...

ਦੂਜੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੁਰਬ ਦੀ ਸਮੂਹ ਸੰਗਤ ਨੂੰ ਲੱਖ-ਲੱਖ ਵਧਾਈ।By Vnita kasnia punjab.ਨਾਨਕ ਕੁਲਿ ਨਿੰਮਲ ਅਵਤਰ੍ਹਿਉ ਅੰਗਦ ਲਹਣੇ ਸੰਗਿ ਹੁਆ॥ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਤਾਰਣ ਤਰਣ ਜਨਮ-ਜਨਮਪਾ ਸਰਣਿਤੁਅ॥ ਧੰਨ ਧੰਨ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ੩੦ ਵੈਸਾਖ 1504 ਈਸਵੀਂ ਨੂੰ ਭਾਈ ਫੇਰੂਮੱਲ ਜੀ ਤੇ ਮਾਤਾ ਦਇਆ ਕੌਰ ਜੀ ਦੇ ਘਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾਂ ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ ਦੇ ਪਿੰਡ ‘ਮੱਤੇ ਦੀ ਸਰਾਂ` ਵਿਖੇ ਹੋਇਆ। ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਨਾ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਸੀ। ਜਦ ਆਪ ਘੋੜੀ ਚੜ੍ਹਕੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨਾ ਲਈ ਤੁਰ ਪਏ ਤੇ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਆ ਪੁਰਖਾ ਮੈਂ ਵੀ ਉੱਧਰ ਹੀ ਜਾਣਾ ਹੈ। ਆਪਣੀ ਧਰਮਸ਼ਾਲਾ ਪੁੱਜ ਕੇ ਜਦ ਗੁਰਦੇਵ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਹੋ ਆਮਨ ਉੱਤੇ ਆ ਬਿਰਾਜੇ ਸਤਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਾਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣ ਜੀ ਨੇ ਮੱਥਾ ਟੇਕ ਕੇ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਇਹ ਉਹੀ ਹਨ ਜੋ ਮੇਰੀ ਘੋੜੀ ਅੱਗੇ-ਅੱਗੇ ਪੈਦਲ ਮੈਨੂੰ ਲਿਆਏ ਹਨ। ਬਸ ਫਿਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਚਰਨੀ ਢਹਿਕੇ ਖਿਮਾ ਮੰਗੀ ਤੇ ਵਾਹ-ਪੁਰਖਾ ਤੇਗ ਨਾਉ ‘ਲਹਿਣਾ` ਹੈ ਜੇ ਤੂੰ ਲਹਿਣਾ ਹੈ ਅਸੀਂ ‘ਦੇਣਾ` ਹੈ। ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਸਮੁੱਚੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਤਿੰਨ ਪਰਤਖ ਹਿੱਸੇ ਬਣਦੇ ਹਨ। ਪਹਿਲਾ ਹਿੱਸਾ ਉਹ ਹੈ ਜੋ ਆਪ ਨੇ ਦੇਵੀ ਪੂਜਾ ਵਿੱਚ ਗੁਜ਼ਰਿਆ ਇਹ ਸੰਨ 1504 ਤੋਂ 1533 ਤੀਕ ਦਾ ਹੈ। ਦੂਜਾ ਹਿੱਸਾ ਉਹ ਹੈ ਜੋ ਆਪਦੀ ਗੁਰੂ ਭਗਤੀ ਵਿੱਚ ਗੁਜਰਿਆ ਸੰਨ 1532 ਤੋਂ 1534 ਤੀਕਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ 62 ਸਲੋਕ ਆਦਿ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਦੀਆਂ ਵਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਅੰਕਿਤ ਹਨ। ਇਹੋ ਆਪ ਜੀ ਦੀ ਸੰਪੂਰਨ ਰਚਨਾ ਹੈ। ਜਿਸਦਾ ਆਕਾਰ ਬਹੁਤ ਥੋੜਾ ਹੈ। ਆਪ ਦੇ ਸਲੋਕ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਆਦਿ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਸੰਨ 1604 ਈ. ਵਿੱਚ ਸੰਪਦਨਾ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ‘ਵਾਂਗ` ਦਾ ਰੂਪ ਕੇਵਲ ਪਉੜੀਆਂ ਦਾ ਹੀ ਸੀ ਅਤੇ ਇੱਕ ‘ਵਾਰ` ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਪਾਉੜੀਆਂ ਇਕੋ ਮਹਲੇ ਜਾ ਕਰਤਾ ਦੀਆਂ ਰਚੀਆਂ ਸਨ। ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਦੀਆਂ ‘ਵਾਰਾਂ` ਵਿੱਚ ਵੇਰਵਾ ਇਸ ਪ੍ਰਚਾਰ ਹੈ ਵਾਰ ਸ੍ਰੀ ਰਾਗ ਮਹਲਾ 2 (ਦੋ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਮਾਝ ਮਹਲਾ 2 (ਬਾਰਾ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਆਸਾ ਮਹਲਾ 2 (ਚੌਦਾਂ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਸੋਰਨਿ ਮਹਲਾ 2 (ਇਕ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ 2 (ਗਿਆਰਾ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ 2 (ਸੱਤ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ 2 (ਇਕ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ 2 (ਨੌਂ ਸਲੋਕ) ਵਾਰ ਸਵਾਰ ਮਹਲਾ 2 (ਪੰਜ ਸਲੋਕ)3. ਵਾਰ ਆਸਾ ਮਹਲਾ 2ਜੇ ਸਉ ਚੰਦਾ ਉਗਵਰਿ ਸੂਰਜ ਚੜਹਿ ਹਜ਼ਾਰਾ॥ਏਤੇ ਚਾਨਣ ਹੌਦਿਆਂ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਅੰਧਾਰ॥2॥(ਗੁਰੂ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਦੇਵਤਾ ਬਣਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸੁਚੇਤ ਕਰਦਾ ਹੈ) ਪਰ ਗੁਰੂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਮਨ ਵਿੱਚ ਅੰਧੇਰਾ ਹੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਭਾਵੇਂ ਸੈਂਕੜੇ ਚੰਦ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਸੂਰਜ ਚੜੇ ਹੋਣ।ਨਾਨਕ ਦੁਨੀਆ ਦੀਆਂ ਵਡਿਆਈਆਂ ਅਵੀ ਸੇਤੀ ਜਾਂਲਿ॥ਏਨੀ ਜਲੀਵੀਂ ਨਾਮ ਵਿਸਾਰਿਆ ਇੱਕ ਨ ਚਲੀਆ ਨਾਲਿ॥2॥ 🙏ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਸਭ ਤੇ ਮੇਹਰ ਕਰੋ ਜੀ 🙏 🙏❤ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕਾ ਖਾਲਸਾ❤🙏 🙏❤ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕੀ ਫਤਹਿ ❤🙏 ❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤

ਦੂਜੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੁਰਬ ਦੀ ਸਮੂਹ ਸੰਗਤ ਨੂੰ ਲੱਖ-ਲੱਖ ਵਧਾਈ। By Vnita kasnia punjab. ਨਾਨਕ ਕੁਲਿ ਨਿੰਮਲ ਅਵਤਰ੍ਹਿਉ ਅੰਗਦ ਲਹਣੇ ਸੰਗਿ ਹੁਆ॥ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਤਾਰਣ ਤਰਣ ਜਨਮ-ਜਨਮਪਾ ਸਰਣਿਤੁਅ॥   ਧੰਨ ਧੰਨ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ੩੦ ਵੈਸਾਖ 1504 ਈਸਵੀਂ ਨੂੰ ਭਾਈ ਫੇਰੂਮੱਲ ਜੀ ਤੇ ਮਾਤਾ ਦਇਆ ਕੌਰ ਜੀ ਦੇ ਘਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾਂ ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ ਦੇ ਪਿੰਡ ‘ਮੱਤੇ ਦੀ ਸਰਾਂ` ਵਿਖੇ ਹੋਇਆ।    ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਨਾ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਸੀ। ਜਦ ਆਪ ਘੋੜੀ ਚੜ੍ਹਕੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨਾ ਲਈ ਤੁਰ ਪਏ ਤੇ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਆ ਪੁਰਖਾ ਮੈਂ ਵੀ ਉੱਧਰ ਹੀ ਜਾਣਾ ਹੈ। ਆਪਣੀ ਧਰਮਸ਼ਾਲਾ ਪੁੱਜ ਕੇ ਜਦ ਗੁਰਦੇਵ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਹੋ ਆਮਨ ਉੱਤੇ ਆ ਬਿਰਾਜੇ ਸਤਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਾਂ ਭਾਈ ਲਹਿਣ ਜੀ ਨੇ ਮੱਥਾ ਟੇਕ ਕੇ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਇਹ ਉਹੀ ਹਨ ਜੋ ਮੇਰੀ ਘੋੜੀ ਅੱਗੇ-ਅੱਗੇ ਪੈਦਲ ਮੈਨੂੰ ਲਿਆਏ ਹਨ। ਬਸ ਫਿਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਚਰਨੀ ਢਹਿਕੇ ਖਿਮਾ ਮੰਗੀ ਤੇ ਵਾਹ-ਪੁਰਖਾ ਤੇਗ ਨਾਉ ‘ਲਹਿਣਾ` ਹੈ ਜੇ ਤੂੰ ਲਹਿਣਾ ਹੈ ਅਸੀਂ ‘ਦੇਣਾ` ਹੈ। ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਸਮੁੱਚੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਤਿੰਨ ਪਰਤਖ ਹਿੱਸੇ ਬਣਦੇ ਹਨ। ਪਹਿਲਾ ਹਿੱਸਾ ਉਹ ਹੈ ਜੋ ਆਪ ਨੇ ਦੇਵੀ ਪੂਜਾ ਵਿੱਚ ਗੁਜ਼ਰਿਆ ਇਹ ਸੰਨ 1504 ਤੋਂ 1533 ਤੀਕ ਦਾ ਹੈ। ਦੂਜਾ ਹਿੱਸਾ ਉਹ ਹੈ ਜੋ ਆਪਦੀ ਗੁਰੂ ਭਗਤੀ ਵਿੱਚ ਗੁਜਰਿਆ ਸੰਨ 1532 ਤੋਂ 1534 ਤੀਕਦਾ ਹੈ। ...